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नागरिक-संचालित शासन

  • connect2783
  • Dec 5, 2025
  • 6 min read

भारत के छोटे शहर इन दिनों तेज़ी से बदल रहे हैं, चाहे बात सड़कों और इमारतों की हो या फिर सामाजिक सुविधाओं की। सरकारें इस बदलाव के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश कर रही हैं, उसी के साथ लोगों की इन बदलावों में भागीदारी इस पूरे बदलाव को संतुलित कर रही है। मोहल्लों के ग्रुप, स्थानीय संगठन और खुद नागरिक, अपने शहर के काम-काज में ज़्यादा जुड़ रहे हैं और यह तय करने में मदद कर रहे हैं कि शहर चलना कैसे चाहिए। नागरिक के ‘Power of Small Cities 2025’ गोलमेज में हमने यह जुड़ाव बेहद साफ़ तौर पर देखा। इस कार्यक्रम का आयोजन दिल्ली में हुआ, जिसमें उदयपुर, कोयंबटूर, पंपोर, भुज और गंगटोक जैसे शहरों से काम करने वाले लोग और शोधकर्ता जुड़े। लेकिन शायद इस सम्मेलन के असल मायने इससे भी बड़े थे। हम सबने मिलकर यह समझने की कोशिश की, कि आने वाले दशकों में छोटे शहरों में नागरिक किस तरह शहर चलाने और फैसले लेने में असली ताक़त बन सकते हैं।


चित्र: ‘Nāgrika: Power of Small Cities 2025’ गोलमेज के प्रतिभागी 
चित्र: ‘Nāgrika: Power of Small Cities 2025’ गोलमेज के प्रतिभागी 

जमीनी स्तर से शासन को नए सिरे से समझना


सबसे मजबूत विचारों में से एक जो उभर कर सामने आया वह था कि ‘नागरिक शक्ति’ कोई धुंधला-सा सिद्धांत नहीं है। यह एक व्यवहारिक वास्तविकता है, एक ऐसी शक्ति है जिसे लोग अपने शहर को बेहतर बनाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। चाहे सुबह-सुबह झील के आस-पास पेट्रोलिंग करना, भूली-बिसरी जलधाराओं का बारीकी से नक़्शा बनाना, या हर हफ़्ते इकट्ठा होकर किसी झील या नदी जैसे पारिस्थितिक स्थल की सफ़ाई, डाक्यूमेन्टैशन (दस्तावेजीकरण), रिकॉर्डिंग या सुरक्षा करना, ये सब ठोस काम ही तो नागरिक शक्ति का प्रमाण हैं।


गोलमेज़ के दौरान प्रतिभागियों ने कहा कि जब वे (नागरिक) ऐसे काम लगातार करते हैं, तो वे उन भूमिकाओं को निभाने लगते हैं जो सार्वजनिक/सरकारी संस्थानों को निभानी चाहिए, लेकिन कई बार संस्थाएं उनको निभा नहीं पाती। नागरिक अधिक नियमित रूप से डाक्यूमेन्टैशन कर रहे हैं, तेजी से प्रतिक्रिया दे रहे हैं, और उन स्थानों की स्मृतियाँ संजोकर रख रहे हैं जो प्रशासनिक बदलावों से अक्सर धूमिल हो जाती है। वे तब भी टिके रहते हैं जब विभागों की प्राथमिकताएँ या राजनीतिक माहौल बदल रहे होते हैं ।


धीरे-धीरे यह देखभाल की एक ऐसी व्यवस्था बन रही है, जो सार्वजनिक/सरकारी संस्थानों की दिशा, प्राथमिकताओं और जवाबदेही को प्रभावित करने लगी है। अब नागरिकों द्वारा बनाई हुई यह व्यवस्था किसी वैकल्पिक प्रणाली की तरह नहीं लगती। बल्कि यह एक ऐसी शासन-प्रणाली बन रही है, जिसे पहचानना और पारंपरिक शासन की परिभाषा में शामिल करना ज़रूरी हो गया है।


चित्र: उदयपुर और कोयंबटूर के हितधारकों और साझेदारों के साथ गोलमेज चर्चा
चित्र: उदयपुर और कोयंबटूर के हितधारकों और साझेदारों के साथ गोलमेज चर्चा

तकनीकी ज्ञान और नागरिक विशेषज्ञता


नागरिक कार्रवाई के बदलते परिदृश्य में, तकनीकी ज्ञान भी अब धीरे-धीरे नागरिक शक्ति का एक नया रूप बनता जा रहा है। शहरी झीलों के संदर्भ में, जहाँ कभी नागरिक केवल सार्वजनिक/सरकारी संस्थानों से ध्यान और हस्तक्षेप की उम्मीद करते थे, वहीं अब स्थिति बदल रही है। नागरिक वह ज्ञान उपलब्ध करा रहे हैं, जिस पर सरकारी संस्थाएँ भी अब निर्भर होने लगी हैं। यह विशेषज्ञता धीरे-धीरे तब विकसित होती है जब नागरिक: शहर की परिस्थितियों को गहराई से समझते हैं, उन जानकारियों को इकट्ठा करते हैं जो सरकारी डेटा में अक्सर छूट जाती हैं, ऐसे पैटर्न पहचानते हैं जो सामान्यतः दिखाई नहीं देते, और मौसम के साथ गंदे पानी के बहाव या किसी जलधारा के व्यवहार का लगातार डाक्यूमेन्टैशन (दस्तावेज़ीकरण) करते रहते हैं।


इसी तरह, नागरिक अपनी व्यक्तिगत क्षमता के अनुसार जमीनी स्तर पर क्या कदम उठा रहें हैं, वह भी महत्वपूर्ण हैं। जैसे: रोज़ झीलों के आसपास घूमना, उनका बार-बार अवलोकन करना, अपने आसपास के वातावरण को गहराई से समझने का प्रयास करना। ये आदतें उन्हें छोटे और सूक्ष्म बदलाव समय रहते पहचानने में सक्षम बनाती हैं; अक्सर तब, जब वे औपचारिक प्रणालियों में अभी तक दर्ज भी नहीं हुए होते।


इस तरह की तकनीकी भागीदारी ने पुनरुद्धार (यानी उनकी सफ़ाई, जलप्रवाह सुधारने, और उनकी सेहत वापस लाने) की एक मजबूत संस्कृति को जन्म दिया है, जहाँ छोटे-छोटे प्रयास विश्वसनीयता बनाते हैं, निर्णय  प्रक्रियाओं को आसान करते हैं, और सहयोगी योजना के लिए आसान मापदंड तैयार करते हैं। यह बदलाव इस बात की ओर इशारा करता है कि शहर में व्यवहारिक ज्ञान किसके पास है, और वह ज्ञान कैसे आगे बढ़ता और साझा होता है।


प्रतिभागियों ने यह भी स्वीकार किया कि ऐसी साझेदारियाँ बहुत संवेदनशील होती हैं। राजनीतिक दबाव, झील-नदी वाले इलाकों के आसपास के व्यावसायिक हित, और बदलती प्रशासनिक प्राथमिकताएँ उस भरोसे और गति को प्रभावित कर सकती हैं, जो नागरिक भागीदारी से होने वाले कार्यों के लिए आवश्यक हैं। ऐसे परिवेश में, नागरिक समूहों की कार्यात्मक स्वतंत्रता बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है; विरोध के रूप में नहीं, बल्कि उनके द्वारा उत्पन्न ज्ञान की निष्पक्षता और विश्वसनीयता की रक्षा के लिए।


पीयर लर्निंग एक आधारभूत ढांचे के रूप में


इस बातचीत के दौरान एक और महत्वपूर्ण विचार जो उभरा, वह था ‘पीयर लर्निंग (Peer Learning)’ यानि सहकर्मियों से या उनके साथ मिलजुलकर सीखना। पीयर लर्निंग के शाब्दिक अर्थ पर जाएं तो पीयर का मतलब है साथी और लर्निंग यानी सीखना। नागरिक-कनेक्ट गोलमेज ने केवल एक चर्चा का मंच ही नहीं, बल्कि ऐसा आमंत्रित मंच (invited space) भी प्रदान किया जहाँ न तो कोई संस्थागत एजेंडा हावी था और न ही कोई पद-क्रम की औपचारिक बाधाएँ। यहाँ लोगों ने खुलकर सोचा, अपने अनुभव साझा किए और एक-दूसरे से सीख ली। 


इस सामूहिक रूप से बनाए गए माहौल में प्रतिभागियों को ईमानदारी से आत्ममंथन करने, अपनी मेहनत से अर्जित सबक साझा करने और बिना किसी औपचारिक अपेक्षा के नए विचार आज़माने की स्वतंत्रता मिली। अलग-अलग शहरों से आए नागरिकों ने इस बात पर भी चर्चा की कि वर्षों तक नागरिक भागीदारी को बनाए रखना कितना चुनौतीपूर्ण होता है। कभी थकावट तो कभी निराशा का सामना करना पड़ता है, पर छोटी-छोटी सफलताएँ उनके विश्वास को लगातार जोड़कर रखती हैं।


इस प्रकार की गोलमेज चर्चा और इसके जैसे अन्य मंच छोटे शहरों के लिए बहुत ज़रूरी हैं। अक्सर नागरिक प्रयास अलग-अलग काम करते हैं और राष्ट्रीय चर्चाएँ बड़े शहरों के इर्द–गिर्द ही सीमित रह जाती हैं। ऐसे मंचों पर न सिर्फ़ ज़मीनी अनुभव साझा किए जाते हैं, बल्कि उन्हें एक महत्वपूर्ण विशेषज्ञता के रूप में भी स्वीकार किया जाता है। इस गोलमेज ने यह स्पष्ट किया कि पीयर-लर्निंग की यह व्यवस्था न केवल सहयोगी नेटवर्क है; बल्कि यह एक तरह का ढांचा है, जो लोगों, प्रथाओं और अनुभवों को जोड़कर समावेशी पर्यावरणीय शासन को मज़बूत बनाता है। ऐसा ज्ञान और समझ औपचारिक प्रणालियों में शायद ही कभी मिल पाती हैं।



निरंतर प्रयास, एक नागरिक शक्ति के रूप में


इन चर्चाओं में एक बात बार-बार उभरकर सामने आई कि निरंतर प्रयास नागरिक शक्ति का एक सरल, लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण रूप है। यह स्पष्ट हुआ कि पर्यावरण से जुड़े स्थानों में सार्थक बदलाव किसी एक बड़े कदम से नहीं आता। बदलाव उन कार्यों से आता है जो तब भी चलते रहते हैं: जब उत्साह कम हो जाए, जब अनुमतियाँ रुक जाएँ, या जब विरोध बढ़ने लगे। कई समूहों ने बताया कि वे कैसे सालों तक, कभी-कभी दशकों तक, बदलती सरकारी प्रक्रियाओं, कमज़ोर फंडिंग, लोगों की हताशा, और अलग-अलग दबावों के बीच लगातार काम करते रहे।


इस दृष्टि से, निरंतर प्रयास केवल धैर्य नहीं , बल्कि एक नागरिक कौशल की तरह दिखाई देती है।यह वह क्षमता है, जिससे लोग बाधाओं के बाद फिर से गति बनाते हैं, जब लोगों की रुचि कम हो जाए तो उन्हें दोबारा जोड़ते हैं, और उस जगह की देखभाल करते रहते हैं, चाहे परिणाम तुरंत दिखाई दे या नहीं। यही लगातार चलता हुआ ध्यान और देखभाल नागरिक प्रयासों को छिटपुट स्वयंसेवी गतिविधियों से आगे ले जाकर एक तरह के शासन में बदल देता है: जो केवल लंबे समय की प्रतिबद्धता से ही संभव है।


चित्र: ‘नागरिक-संचालित शासन’ पर पैनल चर्चा
चित्र: ‘नागरिक-संचालित शासन’ पर पैनल चर्चा

आगे देखते हुए, इस गोलमेज ने यह स्पष्ट कर दिया कि नागरिक शासन में हाशिये पर नहीं हैं; बल्कि वे एक केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं; जहां वे रोज़मर्रा की देखभाल, डाक्यूमेन्टैशन, निगरानी और वकालत के माध्यम से शहर के भविष्य को आकार दे रहे हैं। उनके योगदान शासन की परिभाषा को ही व्यापक बना रहे हैं, यह दिखाते हुए कि शासन केवल कार्यालयों या औपचारिक अधिकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लगातार नागरिक सक्रियता के माध्यम से भी निर्मित हो सकता है।


नागरिक-कनेक्ट इस असंगठित प्रतिभा को एक दृश्य, संगठित और प्रभावशाली शक्ति में बदल रहा है। इसका मिशन नागरिक शक्ति को बढ़ाना, नागरिक नेटवर्क को मजबूत करना, नागरिक ज्ञान को मुख्यधारा में लाना और समुदाय-आधारित सिटी लर्निंग और कार्रवाई का एक ईकोसिस्टम बनाने का है। नागरिक पहलों को समझने योग्य, सम्मानित और संस्थागत रूप से मान्यता दिलाकर, हमारा प्रयास शासन की समझ को ही बदलने का है। हम भारत के शहरी परिदृश्य में नागरिकों को केंद्र में लाने और ऐसे प्लेटफ़ॉर्म, साझेदारी और ज्ञान प्रणाली विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं, जो उनकी शक्ति को नजरअंदाज करना असंभव बना दें।



यह गोलमेज़ चर्चा Rohini Nilekani Philanthropies के सहयोग से आयोजित की गई थी।


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