मंडला के घाट
Second Position, Hindi, Nāgrika Youth Writing Contest 2026
By Bhawna
City: Mandla, Madhya Pradesh
मैकल की पहाड़ियों से निकलकर बहती माँ नर्मदा के तट पर बसा है मंडला — चौबीस घाटों का एक पावन कुनबा। इस जीवंत कथा में स्वयं 'रपटा घाट' सूत्रधार बनकर अतीत और वर्तमान के ताने-बाने को बुनता है। वह देखता है बैगा समुदाय के महतो को, घटते जंगलों को, और बदलते बाज़ारों को। महात्मा गांधी के नारों की गूँज से लेकर राजाओं के खंडहर होते किलों, सिमटती परंपराओं और आधुनिकता की होड़ तक — नदी के शांत जल में इतिहास, स्मृतियाँ और मानवीय पीड़ा सब एक साथ बहती हैं।
यह कहानी है समय के उस बहते चक्र की, जहाँ इंसान, जंगल और नदियाँ सब एक अदृश्य डोर से बँधे हैं।

सब कुछ एक चक्र के माध्यम से आपस में जुड़ा हुआ है। हममें से प्रत्येक एक चलती-फिरती नदी है, जिसे हमारी कागज़ जैसी पतली त्वचा बांधे रखती है।
महतो एक टैक्सी ड्राइवर है जो जबलपुर से कटनी तक टैक्सी चलाता है। मैं उसे अपनी ओर आता देख रहा हूं। उलझे हुए उसके बाल काले और घने हैं वह सुनहरी भूरी त्वचा वाला लड़का जिसके चेहरे की बनावट सौम्य है मंडला की मड़ई देखने अपने घर आया है।
मैं हूँ रपटा घाट, जो मंडला के शहर के मध्य में पश्चिमी छोर पर स्थित है मंडला को घाट नगर भी कह सकते हैं। मैं और मेरे बाकी साथी पश्चिम से पूर्व तक नर्मदा के किनारे बनाए गए हैं। पूरा कुनबा मिलाकर चौबीस घाट।
नर्मदा नदी ने मंडला को तीन छोर से घेरा हुआ है मैं कहूंगा कि मंडला नर्मदा के कुंडल में बसा एक अत्यंत रमणीय, साल के जंगल से आच्छादित शहर है।
जो महतो मेरी सीढियों पर बैठ कर पुण्यसलिला माँ नर्मदा को देख रहा है वो मेयकल पहाड़ी के किनारे रहने वाले बैगा समुदाय से है। एक बैगा को किसी वन गांव के बाजार में तुरंत पहचाना जा सकता है। महतो का सिर लम्बा और चेहरे की बनावट बाज जैसी है। संध्या की आरती के बाद यहां जो बच जाते हैं वो नदी को बात करने को करने के लिए उकसाते हैं।
नदी तुम दो किनारों के बीच ही क्यूँ बहती हो क्या तुम बिना तट के नहीं रह सकती ? बोलो!अब नर्मदा मैया तो बस चहानों में ही बड़बडाती है, किंतु मैदान में आते ही शांत हो जाती है।
जेठू ने अपना कान पास पड़े पत्थर पर लगाया जो आंशिक रूप से पानी में डूबा हुआ था और मेरे बोलने की प्रतीक्षा करी,मैंने भी उसके प्रश्न को आंमत्रित करते हुए एक मधुर आवाज दी।— क्योंकि तुम जेठ के महीने में पैदा हुए थे।
उस दिन नदी तट अपेक्षा से कहीं अधिक जटिल था पर धीरे-धीरे जेठू को घाट की सूक्ष्म परतों का एहसास होता जा रहा था।
जेठू – यहाँ से तुम्हें वो जंगल कैसा दिखाई देता है!
अब वह पहाड बहुत दूर दिखाई पड़ता है। पहाड़ का गंजा गुम्बद, जंगली रास्ते, सतपुड़ा के सघन पठार और पेड़ों की कटाई, जंगल हर-रोज दूर जाता दिखाई देता है।
जेठू – क्या तुमने पास से कभी जंगल देखा है।
हाँ, मेने बचपन उन सघन वनों में बिताया है जो एक सागर जितने घने थे। अनेको पहाड़ और अजगरों से घिरे हुए। उन वनों में भीतर बीच में झोपडी पर फूस डाल कर बैगा, कोल और भारिया समूह रहते थे। जिनका पूरा जीवन जंगल के ऊपर आश्रित था। गोंड राजाओ ने मुझे वहाँ से उठाकर यहां शहर के मध्य में मेकलसुता के किनारे बसाया। जिस रामनगर किले की परछाई तुम मुझमें तैरती देख रहे हो राजा वहीं से आते थे। जब जंगल बदलता है तो संबंध भी बदल जाते हैं। तुमसे अच्छी तरह ये कौन जानता है जेठू! जब जंगल बदलता है तो जीविका बदलती है। फिर रोजमर्रा का जीवन बदल जाता है और साथ ही पुराने ज्ञान और परंपराएं खतम हो जाती हैं।
पहले मड़ई में तुम्हारे बाबा अपने द्वारा बनाई गई चटाईयां, टोकरियां, जंगली फल, जड़ें, शहद जानवरों के सींग, बेचने के लिए आते थे और उसी में से अपनी साप्ताहिक खरीदारी करते। फिर अपने पैसों को कौडी के खोल में बदलते।वह तंबाकू,नमक, मिर्च खरीदते बस थोड़ी कोदो थोड़ी कुटकी के लिए। घर लौटने से पहले शराब की दुकान पर खर्च करने के लिए कुछ पैसे बचा लेते। उसके सिर लिपटे हुए कपडे के टुकड़े के कोनों में उसकी खरीदी हुई वस्तुएं बंधी हुई रहती, ये सभी वस्तुएँ आज के दौर में बाहर के कारखानों से लाकर मड़ई में बाजारों से बेची जाती हैं।
जेठू – क्या तुम सब कुछ देख सकते हो?
घाट– नहीं। लेकिन जो कुछ नदी के इस छोर पर होता है बस वही। मैं सारे शहर का मिलन स्थल हूं। लोग सूर्यास्त देखने और प्रार्थना के लिए यहाँ आते हैं।
मेरे पास वाले रंगरेज घाट पर मुझे अभी भी शोर सुनाई देता है स्वतंत्रता के नारों का, जहाँ महात्मा गांधी ने अछूतो के साथ होने वाले भेदभाव के विरूद्ध आंदोलन को संबोधित किया था। उन नारों को सिल्क बुनकरों द्वारा साड़ी रंगने के व्यवसाय में बदलता देख पाता हूं मैं।
देख पाता हूँ पूर्वी छोर की ओर जाते हनुमान घाट को जहाँ से शहर खेतों में विलीन हो जाता है।
राजघाट का जो किला ढोल-मांदर की थाप पर झूम उठा करता था आज उस गढ़-मंडला के किले को खंडहर में बदलता देख पाता हूँ। यह किला शहर के दक्षिणी छोर पर तीन ओर से नदी से घिरा हुआ था। इसके उत्तरी किनारे की सुरक्षा के लिए दो गहरी खाई बनाई गई थी जो नर्मदा में जा मिलती थी, आज यह शहर उत्तर की ओर बढ़ गया और मुहाने खुले नालों में तब्दील हो गए, जिसका गंदा पानी नदी में मिल जाता है।
जिस लोहे के बेंच पर तुमने अपना सामान टिकाया है मैं उस बेंच को बालाघाट से आए लौह अयस्क में बदलता पाता हूँ और ये जो बड़ा पुल है मेरे ऊपर देख रहे हो इसको वापस खेतों में बदलता देख पाता हूँ।
बेसाल्ट के पत्थरो का धीरे-धीरे घुलना और वापस आकर नदी की मैली - कुचैली धार में बहता देख पाता हूं। मैं देखता हूं नदी में बैठकर समंदर पार जाने वाले संदूक जिनमे से अफीम की मत्त् करती बास आती है।
रेवा का ये पानी जो निरंतर बह नहीं पाता, बीच-बीच में टूटता,रुकता और चलता इसके विपरीत उस ठेकेदार को हंसता पाता हूँ।
याद करता हूं रानी अंवतीबाई की वीरता जो आजादी से पहले ही कर गई मंडला को स्वतंत्र । और देख पाता हूँ महाप्रसाद महतों को दु:खी अपने कम वेतन से जिसके पास दस बीघा की खेती है। जो जबलपुर से कटनी तक टैक्सी चलाता है उसे पास के एक स्कूल में पढ़ाता हुआ देख पाता हूँ।
कजली–बन–पहाड़ पर काली मिट्टी के उसके गांव में उसे कुछ पीढ़ी पहले किसी पूर्वज में बदलता हुआ पाता हूं। जो गेवारी और दिसावर मछली पालता और खेती करता है।उसे अपने परिवार-जनों के बीच हंसता बतियाता पाता हूँ।
नदी अपने रहस्यों और गूढ़ बातों को समेटे चुपचाप बहती रहती है ये अपना भार और अपनी यादें समुंद्र में बहा देती है।
लेखक के बारे में:

भावना
मैने अपनी मास्टर्स की पढ़ाई पूरी की है। मैं अपने लिए नई दिशाएँ तलाशने और अपनी दुनिया को अपने तरीके से समझने की कोशिश कर रही हूं।
मुझे लिखने के साथ-साथ स्वयं को समझने, आत्म-जागरूकता और आत्म-विकास से जुड़े विचारों को तलाशना पसंद है। मेरे लिए लिखना स्वयं को समझने और अपने आसपास की दुनिया को एक अलग नज़र से देखने का माध्यम है। मैं उन अनुभवों को शब्द देना चाहती हूं, जिनसे हम सभी किसी न किसी रूप में जुड़ते हैं
इसी खोज का एक हिस्सा मेरा लेखन भी है।मेरा मानना है कि लेखन केवल पढ़ने के लिए नहीं है, पाठक उस रास्ते पर चलें और अपनी सोच के रास्ते खोले ।
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