शहर जिसे जिया था।
Special Mention, Hindi, Nāgrika Youth Writing Contest 2026
By Suhani Joshi
City: Nainital, Uttarakhand
नैनीताल को जानने का दावा सब करते हैं, पर उसे सबसे गहराई से जानता है उसका ताल। उसने वीरान दिन देखे, सैलानियों की भीड़ देखी, और पहाड़ी लोगों की चुप्पी में छिपी भूख भी देखी। शहर को धुआँ होने से बचाने वाले हाथों को देखकर उसकी आँखें भर आती हैं और पानी बारिश बनकर बरस पड़ता है। जाने वाले चले जाते हैं, पर यह शहर उनके भीतर बस जाता है, कभी न छूटने के लिए।

शहर है नैनीताल, जिसके चर्च देश-विदेश न जाने कहाँ-कहाँ मशहूर है। आज, चर-परिचित सबकी जुबान बदल चाकर जाने वाली याद की तरह यह फिल्म जगत, सिनेमा गीत और उपन्यास में देखा, सुना और पढ़ा जाता रहा है। जीडी छावास के अबोध छात्राएँ यह दावा करती हैं कि नैनीताल को उनसे बेहतर कोई नहीं जानता, सैलानियों का भी ठीक यही कहना है लेकिन सच तो यह है कि नैनीताल को उसके ताल से बेहतर कोई नहीं जानता। उसका यह ताल उसे नियत ने दिया है और शहर को यह गोल भूगोल इस ताल ने दिया है। कहना न होगा कि दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। इस बिना कोने के शहर को अलग-अलग कोने (कोण) से देखा है इस ताल ने। जब यह शहर वीरान था तब भी, जब लोग बस गए तब भी। जब नैनीताल की ऊपर वाली माल रोड में कीड़े बरसाते अंग्रेज दादा बने घूमते और नीचे की माल रोड में भारतीय गुमसुम चलते तब भी और आज जब इस शहर में पर्यटन ने गति पकड़ ली है तब भी।
ताल को नाव का अंत संगम, बादल की आकृतियाँ, बारिश से तर नहाया शहर आ लगता है और इसका पलक झपकते ही मौसम के साथ बदल जाना भी। देखो कैसे बकुल धुला आ साफ हो जाता है यह। इधर छावनी का रोमांचक य उधर मली ताल का बाज़ार और ज़र दा के थियेटर में थरकते छा। डाने (पहाड़ का शरा) की तरफ देखो तो कुमाऊँवाले की सुंदर इमारत देखने को मिलती है। लंघम से माल रोड देखो तो यहाँ के गरजाघर की इमारत लंदन सी मालूम पड़ती है। आज का राजभवन, हाईकोर्ट, सेंट जोसेफ स्कूल और चर्च अंग्रेज के समय के हैं। नौ बजे चर्च की घंट से नैनीताल उठता है और मम-मम गति से पर्यटन की दौड़ में निकल पड़ता है। यहाँ लोगों के घर, होटल, वालियाँ ऊँचाई पर हैं। ऊँची सड़कें देखकर कौन कहेगा कि सड़कें सीधी भी होती होंगी। कम से कम ताल को तो अब यही लगने लगा है और कुमाऊँवालों में पढ़ने वाले छात्रों को भी।
पिछले कुछ साल से ताल ने गौर किया कि कई बार नैनीताल में वही रहता है पर यहाँ यान तुरंत बदल जाते हैं। यहाँ के गोल भूगोल पर नगरपालिका वालों ने समूचे योग कर डाले हैं (शायद पूरी पृथ्वी पर उनके लिए यह योग करना संभव नहीं रहा होगा)। कभी पार्क बनवाते हैं तो मूर्त लगाना भूल जाते हैं, कभी मूर्त खड़ी करते हैं तो अतिक्रमण की जाँच का समय हो जाता है। सड़कें बनवाते हैं तो बरसात आ पड़ती है, अब नाले भी या कर भला, रसकर सड़क पर आ जाते हैं। इनके ठीक होने तक फिर वही अगली बरसात। सच में नैनीताल में कुछ न कुछ बनता या बदलता रहता है। परिवर्तन तो हर तरह से यहाँ की वृत्ति है। ताल नगरपालिका की सूझ-बूझ को दाद देता है कि ये बात इन्हें ठीक मालूम है और विद्यालय में पढ़ने वाली लड़कियों को दयनीयता से देखता है जो इस बदलते परिवेश में उसके किनारे आए प्रेम खोजती रही हैं। अब तो उनकी नवाज मजाती प्रार्थना की तरह नैनीताल की माल रोड भी धँसने लगी है जो कभी भी ताल के विशाल मुँह में समा जाएगी और तब वह क्या करेगा? अपलक देखता रहेगा शायद वह।
उसने भूगोल के छात्रों को कहते हुए सुना है कि नैनीताल अवसाद चट्टान पर बना है। असंख्य घर, होटल, सैलानियों की हद से ज्यादा भीड़ वह सहन नहीं कर सकेगा। इस पर उसने हामी भरी है। साहित्य वाले उसके कान पर कह गए हैं कि नैनीताल सहनशील है। वह सारा भार उतनी ही शांति से उठा सकता है जितनी शांति से वह प्रेम को अपनी गोद में फुदकने देता है और चुप्पी के साथ उनका अलगाव कर उन्हें विदा कर देता है। इस पर भी वह हामी भर देता है जैसे वह निर्विवाद रूप से सब देखता आ रहा हो, सब सुन रहा हो। ताल ने आज तक कितनी ही आवाज सुनी, देखी और समझी लेकिन प्रोफेसर डी. एस. परिहार की ये बात "समाज और संस्कृति के पीछे भूगोल का एक रोल होता है बेटा।" उसे ठीक-ठिकाने मालूम हुई जो क्षेत्रीय सर्वेक्षण के दौरान अपने विद्यार्थियों को ये बताते थे। उसने नैनीताल को भूगोल के साथ समाज के चश्मे से भी देखा है। इस गोल भूगोल में नैना देवी मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारेक कोणमती, मॉल रोड में कतार से लगे गिरजे घर देखने में उसे खासी दिलचस्पी रही है कि विविधता में एकता के दर्शन तो उसे यह हो जाते हैं। यहाँ के लोग समय-समय पर धार्मिक आयोजन कर के उसका मन बहलाए रखते हैं और सांस्कृतिक तत्वों को जोड़कर एक समाज बनाने की पूरी कोशिश करते हैं। इन सब में काम आता है- डी.एस.ए ग्राउंड। हालांकि यह खेलने के लिए है पर सांस्कृतिक गतिविधियों में भी काम आता है। नैनीताल का मशहूर नंदादेवी मेला यह लगता है।
शहर का गोल भूगोल और उस पर नगरपालिका की नकाशी तो उसे समझ भी आई है पर नैनीताल का समाज उसे ठीक से समझ नहीं आया। कभी-कभी पर्यटन की यादती देखकर उसे लगता है कि यहाँ का समाज आर्थिक समाज हो गया है। अपने विशाल आकार से शहर का चक्कर काटते हुए वह अपने किनारे ऊनी कपड़े, चाय और घाम (धूप) बेचते पहाड़ी लोगों को देखता है जो पर्यटन के सहारे अपना जीवन बसर करते आए हैं, उसने देखा है कि कैसे ये लोग पर्यटक के अनुचित व्यवहार और बुरी बातों को कुहासे के साथ विदा कर देना जानते हैं, कैसे उनकी कटुता इनकी गरिमा को ठोकर मारती है। ताल ने उनकी कातर आँखों में भूख और दयनीयता देखी है। पार्क में खेलते बच्चों को गुब्बारे के साथ अपना बचपन बेचते देखा है। यहाँ के लोग समावेशी हैं? शायद नहीं, वे सबसे पहले नेता-वेता हैं बाद में कुछ और। कोई इतना ऊँचा कि ज़मीन न देख पाता और कोई ज़मीन की गहराई में धंसता ही चला जाता है। एक तरह से सही तो सोचा है उसने- 'यहाँ का समाज आर्थिक समाज होने लगा है जिसका आर्थिक खाई को पाटना अब मुश्किल होता जा रहा है, बहुत मुश्किल होता जा रहा है।'
सैलानियों से थका ताल कभी-कभी उदास ठंडी रात में खुद को खोजता है तो निराश हो उठता है। अपने तैलीय पानी से गंदगी का अनुमान लगा पाता है। बारिश के बाद अपने ऊपर लोट जाने वाले कचरे को देखता है। अपने भीतर इधर से उधर दौड़ती मछलियों को देखता है जो अब अपना प्राकृतिक भोजन खाना भूल चुकी हैं और पर्यटक से भुजा, मोमो की अनावश्यक मांग करती रही हैं। वह इसे पर्यटन का अभिशाप मानता है और बदमाश मछलियाँ इसे वरदान की तरह देखती हैं। भूख सबसे बड़ी चीज होती है, शायद इसलिए ही तो। उसने भूख को हर तरह से समझने की कोशिश की है।
सैलानियों की भीड़ से, गाड़ियों के शोर से और जगह-जगह कचरे के ढेर से संघर्ष करते इस शहर को ताल ने हमेशा खुलकर जीते देखा है। शहर में नया माह नए जीवन की तरह आता है। बर्फ से ढका जनवरी, फूल से लदे फरवरी और मार्च, जेठ की शीतल गर्मी, आषाढ़ की पहली बारिश, अगस्त में सावन की घटा, सितंबर में नंदा देवी मेला, अक्टूबर में दशहरा, बीच-बीच में गुरुद्वारे के लंगर, जुमे की रात। दिसंबर आने तक समस महकता नैनीताल जो हमेशा सैलानियों से छक हो जाया करता है। नैनीताल कभी कम नहीं रहा है, उसने नैनीताल को हमेशा हर तरह से बढ़कर होते देखा है।
आज इतने दिन से उसकी नज़र एक जगह की गई है, वह देख रहा है यहाँ के स्थानीय लोगों को जो बिना शिकायत के यहाँ बने रहे हरदम और हमेशा। इन लोगों ने 'क्लीन नैनीताल' प्रोजेक्ट के तहत कितनी जगह, कितने नाले साफ कर डाले हैं। अयारपाटा, बबूज से लेकर सात नंबर के गलियारे। चीना पीक, ठंडी सड़क से लेकर मल्लीताल का बाजार। कचरे को हटा-हटा कर जमीन खोजते लोग जैसे इस गोल भूगोल की ओजोन में छ होने से बचा लगे, अपने इस शहर को धुआँ होने से बचा लगे। ताल सब देख रहा है अपलक, उसकी आँख में आँसू हैं। आज उसका पानी बारिश बनकर इस शहर में बरस रहा है।
लोग काम में लगे हैं वह देख रहा है। लोग सब कुछ जानते हुए भी प्रेम में समर्पित हैं वह देख रहा है, जो प्रेम फूहड़ लोगों के बीच होता है वह खूब चलता है, उसने सीखा है इस शहर से।
ताल लोगों को आते-जाते देख रहा है। इस शहर में आते लोगों के लिए सावन की घटाएं आकाश में नर्तन कर रही हैं, पंछियों का कलरव गूंज रहा है, ताल की छोटी सी लहर हिलोरे भर रही है। जाते लोगों के लिए यह चलायमान हो गए हैं, बारिश गिरने लगी है और वे अपनी पोटली में अपने हिस्से का नैनीताल भर के ले जा रहे हैं जो उनकी शिरा में तब तब दौड़ेगा जब तक वह अपने 2/4 के लैट में याद का बसा खोलकर न बैठ जाएं। ताल ने सुना है जीडी होटल की कनु को जो मीनल से कह रही है- ‘जीवन मधुन की तरह आनेवाला और राग की तरह गानेवाला शहर है नैनीताल। उसके राग रोम-रोम में बसे हैं, ये शहर छोड़ने पर भी नहीं छूटेगा, कभी नहीं छूटेगा।'
मीनल के साथ ताल ने भी हामी भरी है, इस शहर को जानने का दावा करने वाले लोगों को वह कभी नकार सकता है भला?
लेखक के बारे में:

सुहानी जोशी
मेरा नाम सुहानी जोशी है। मैं नैनीताल, उत्तराखंड से हूँ। वर्तमान में मैं काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में परास्नातक कर रही हूँ। कविता और संस्मरण लिख रही हूँ। भविष्य में पितृसत्ता और स्त्री विमर्श की तहों को खोजने के लिए प्रयासरत हूँ।
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