शहर जिसे जिया था।
Updated: Oct 19
Special Mention, Hindi, Nāgrika Youth Writing Contest 2026
By Suhani Joshi
City: Nainital, Uttarakhand
नैनीताल को जानने का दावा सब करते हैं, पर उसे सबसे गहराई से जानता है उसका ताल। उसने वीरान दिन देखे, सैलानियों की भीड़ देखी, और पहाड़ी लोगों की चुप्पी में छिपी भूख भी देखी। शहर को धुआँ होने से बचाने वाले हाथों को देखकर उसकी आँखें भर आती हैं और पानी बारिश बनकर बरस पड़ता है। जाने वाले चले जाते हैं, पर यह शहर उनके भीतर बस जाता है, कभी न छूटने के लिए।

शहर है नैनीताल जिसके चर्चे देश - विदेश न जाने कहाँ कहाँ मशहूर हुए। अज्ञात,चिर - परिचित सब की जुबान में दिल चस्पा कर जाने वाली यादों की तरह यह फिल्म जगत, सिनेमा गीतों और उपन्यासों में देखा,सुना और पढ़ा जाता रहा है। जी डी छात्रावास की अबोध छात्राएं यह दावा करती हैंं कि नैनीताल को उनसे बेहतर कोई नहीं जानता, सैलानियों का भी ठीक यही कहना है। लेकिन सच तो यह है कि नैनीताल को उसकी ताल से बेहतर कोई नहीं जानता। उसका यह ताल उसे नियति ने दिया है और शहर को यह गोल भूगोल इस ताल ने दिया है। कहना न होगा कि दोनों एक- दूसरे के पूरक हैं। इस बिना कोने के शहर को अलग- अलग कोने (दृष्टिकोण) से देखा है इस ताल ने। जब यह शहर वीरान था तब भी,जब लोग बस गए तब भी। जब नैनीताल की ऊपर वाली माल रोड में कोड़े बरसाते अंग्रेज दादा बने घूमते और नीचे की माल रोड में भारतीय गुमसुम चलते तब भी और आज जब इस शहर में पर्यटन ने गति पकड़ ली है तब भी।
ताल को नाव का अद्भुत संगम, बादलों की आकृतियाँ, बारिश से तर नहाया शहर अच्छा लगता है और इसका पलक झपकते ही मौसम के साथ बदल जाना भी। देखो कैसे बिल्कुल धुला हुआ साफ हो जाता है यह। इधर छावनी का रोमांचक दृश्य उधर मल्ली ताल का बाज़ार और ज़हूर दा के थियेटर में थिरकते छात्र। डाने (पहाड़ का शिरा) की तरफ देखो तो कुमाऊँ विश्वविद्यालय की सुंदर इमारत देखने को मिलती है। लंघम से माल रोड देखो तो यहाँ के गिरजाघर की इमारतें लंदन सी मालूम पड़ती हैं। आज का राजभवन, हाईकोर्ट, सेंट जोशेफ स्कूल और चर्च अंग्रेजों के समय के हैं। नौ बजे चर्च की घंटी से नैनीताल उठता है और मद्धम मद्धम गति से पर्यटन की दौड़ में निकल पड़ता है। यहाँ लोगों के घर, अस्पताल,विद्यालय ऊँचाई पर हैं। ऊँची सड़के देखकर कौन कहेगा कि सड़के सीधी भी होती होंगी। कम से कम ताल को तो अब यही लगने लगा है और कुमाऊँ विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्रों को भी।
पिछले कुछ सालों से ताल ने गौर किया कि कई बार नैनीताल में दृश्य वही रहता है पर दृश्य स्थान तुरंत बदल जाते हैं। यहाँ के गोल भूगोल पर नगरपालिका वालों ने समूचे प्रयोग कर डाले हैं (शायद पूरी पृथ्वी पर उनके लिए यह प्रयोग करना संभव नहीं रहा होगा)। कभी पार्क बनवाते हैं तो मूर्ति लगाना भूल जाते हैं, कभी मूर्ति खड़ी करते हैं तो अतिक्रमण क्षेत्र की जाँच का समय हो जाता है। सड़के बनवाते हैं तो बरसात आ पड़ती है, अब नाले भी क्या करें भला, रिसकर सड़कों पर आ जाते हैं। इनके ठीक होने तक फिर वही अगली बरसात। सच में नैनीताल में कुछ न कुछ बनता या बदलता रहता है। परिवर्तन तो हर तरह से यहाँ की प्रवृत्ति है। ताल नगरपालिका की सूझ बूझ को दाद देता है कि ये बात इन्हें ठीक मालूम हुई और विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली लड़कियों को दयनीयता से देखता है जो इस बदलते परिवेश में उसके किनारे स्थायी प्रेम खोजती रही हैं। अब तो उनकी निर्वात में जाती प्रार्थनाओं की तरह नैनीताल की माल रोड भी धसने लगी है जो कभी भी ताल के विशाल मुँह में समा जाएगी और तब वह क्या करेगा? अपलक देखता रहेगा शायद वह।
उसने भूगोल के छात्रों को कहते हुए सुना है कि नैनीताल अवसादी चट्टान पर बना है, असंख्य घर, होटल, सैलानियों की हद से ज्यादा भीड़ वह सहन नहीं कर सकेगा। इस पर उसने हामी भरी है। साहित्य वाले उसके कान पर कह गए हैं कि नैनीताल सहिष्णु है। वह सारा भार उतनी ही शांति से उठा सकता है जितनी शांति से वह प्रेमियों को अपनी गोद में फुदकने देता है और चुप्पी के साथ उनका अलगाव कर विदा कर देता है। इस पर भी वह हामी भर देता है जैसे वह निर्विवाद रुप से सब देखता आ रहा हो, सब सुन रहा हो। ताल ने आज तक कितनी ही आवाजें सुनी, देखी और समझी लेकिन प्रोफेसर डी एस परिहार की ये बात "समाज और संस्कृति के पीछे भूगोल का एक रॉल होता है बेटा।" उसे ठीक ठिकाने की मालूम हुई जो क्षेत्रीय सर्वेक्षण के दौरान अपने विद्यार्थियों को ये बतलाते थे। उसने नैनीताल को भूगोल के साथ समाज के चश्मे से भी देखा है। इस गोल भूगोल में नैना देवी मन्दिर, मस्जिद और गुरुद्वारे की त्रिकोणमिती, मॉल रोड में कतार से लगे गिरजे घर देखने में उसे खासी दिलचस्पी रही है क्योंकि विविधता में एकता के दर्शन तो उसे यहीं हो जाते हैं। यहाँ के लोग समय समय पर धार्मिक आयोजन कर के उसका मन बहलाए रखते हैं और उसमें सांस्कृतिक तत्वों को जोड़कर एक समाज बनाने की पूरी कोशिश करते हैं। इन सब में काम आता है - डी एस ए ग्राउंड। हालांकि यह खेलने के लिए है पर सांस्कृतिक गतिविधि में भी काम आ जाता है। नैनीताल का मशहूर नंदादेवी मेला यहीं लगता है।
शहर का गोल भूगोल और उस पर नगरपालिका की नक्काशी तो उसे समझ भी आई है पर नैनीताल का समाज उसे ठीक से समझ नहीं आ पाया। कभी कभी पर्यटन की ज्यादती देखकर उसे लगता है कि यहाँ का समाज आर्थिक समाज हो गया है। अपने विशाल आकार से शहर का चक्कर काटते हुए वह अपने किनारे ऊनी कपड़े ,चाय और घाम (धूप) बेचते पहाड़ी लोगों को देखता है जो पर्यटन के सहारे अपना जीवन बसर करते आए हैं, उसने देखा है कि कैसे ये लोग पर्यटकों के अनुचित व्यवहार और बुरी बातों को कुहासे के साथ विदा कर देना जानते हैं, कैसे उनकी कर्कशता इनकी गरिमा को ठोकर मारती है। ताल ने उनकी कातर आँखों में भूख और दयनीयता देखी है। पार्क में खेलते बच्चों को गुब्बारे के साथ उनका बचपन बेचते देखा है। यहाँ के लोग क्या समावेशी हैं? शायद नहीं,वे सबसे पहले क्रेता-विक्रेता हैं बाद में कुछ और। कोई इतना ऊँचा कि जमीं नहीं देख पाता और कोई जमीन की गहराई में धसता ही चला जाता है। एक तरह से सही तो सोचा है उसने - 'यहाँ का समाज आर्थिक समाज होने लगा है जिसकी आर्थिक खाई को पाटना अब मुश्किल होता जा रहा है, बहुत मुश्किल होता जा रहा है।'
सैलानियों से थका ताल कभी - कभी उदास ठंडी रातों में खुद को खोजता है तो निराश हो उठता है। अपने तैलीय पानी से गंदगी का अनुमान लगा पाता है। बारिश के बाद अपने ऊपर लोट जाने वाले कचरे को देखता है। अपने भीतर इधर से उधर दौड़ती मछलियों को देखता है जो अब अपना प्राकृतिक भोजन खाना भूल चुकी हैं और पर्यटकों से भुट्टा,मोमो की अनावश्यक मांग करती रही हैं। वह इसे पर्यटन का अभिशाप मानता है और बदमाश मछलियाँ इसे वरदान की तरह देखती हैं। भूख सबसे बड़ी चीज होती है शायद इसीलिए ही तो। उसने भूख को हर तरह से समझने की कोशिश की है।
सैलानियों की भीड़ से, गाड़ियों के शोर से और जगह - जगह कचरे के ढेर से संघर्ष करते इस शहर को ताल ने हमेशा खुलकर जीते देखा है। शहर में नया माह नए जीवन की तरह आता है। बर्फ से ढकी जनवरी,फूलों से लदे फरवरी और मार्च, जेठ की शीतल गर्मी, आषाढ़ की पहली बारिश, अगस्त में सावन की घटा,सितम्बर में नंदा देवी मेला, अक्टूबर में दशहरा, बीच बीच में गुरुद्वारे के लंगर, जुम्मे की रातें। दिसंबर आने आने तक क्रिसमस में महकता नैनीताल जो हमेशा सैलानियों से छक हो जाया करता है। नैनीताल कभी कम नहीं हुआ है, उसने नैनीताल को हमेशा हर तरह से बढ़कर होते देखा है।
आज बहुत दिनों से उसकी नज़र एक जगह रुक गई है,वह देख रहा है यहाँ के स्थानीय लोगों को जो बिना शिकायत के यहाँ बने रहे हैं हरदम और हमेशा। इन लोगों ने 'क्लीन नैनीताल’ प्रोजेक्ट के तहत कितनी जगह,कितने नाले साफ कर डाले हैं। अयारपाटा, बम्बूज से लेकर सात नंबर के गलियारे। चीना पीक, ठंडी सड़क से लेकर मल्ली ताल का बाजार। कचरे को हटा हटा कर जमीन खोजते लोग जैसे इस गोल भूगोल की ओजोन में छिद्र होने से बचा लेंगे, अपने इस शहर को धुआँ होने से बचा लेंगे। ताल सब देख रहा है अपलक, उसकी आँखों में आँसू हैं। आज उसका पानी बारिश बन कर इस शहर में रिस रहा है। लोग काम में लगे हुए हैं वह देख रहा है। लोग सब कुछ जानते हुए भी प्रेम में समर्पित हैं वह देख रहा है, जो प्रेम फूहड़ लोगों के बीच होता है वह खूब चलता है, उसने सीखा है इस शहर से।
ताल लोगों को आते जाते देख रहा है। इस शहर में आते लोगों के लिए सावन की घटाएं आकाश में क्रंदन कर रही हैं, पंछियों का कलरव गूंज रहा है, ताल की छोटी सी लहर हिल्लोरे भर रही है। जाते लोगों के लिए दृश्य चलायमान हो गए हैं, बारिश गिरने लगी है और वे अपनी पोटली में अपने हिस्से का नैनीताल भर के ले जा रहे हैं जो उनकी शिराओं में तब तब दौड़ेगा जब तक वह अपने 2/4 के फ्लैट में यादों का बक्सा खोलकर न बैठ जाएं।
ताल ने सुना है जी डी हॉस्टल की कनु को जो मीनल से कह रही है - ‘जीवन में धुन की तरह आने वाला और राग की तरह जाने वाला शहर है नैनीताल। उसके राग रोम रोम में बसे हुए हैं, ये शहर छोड़ने पर भी नहीं छूटेगा,कभी नहीं छूटेगा।' मीनल के साथ ताल ने भी हामी भरी है।
लेखक के बारे में:

सुहानी जोशी
मेरा नाम सुहानी जोशी है। मैं नैनीताल, उत्तराखंड से हूँ। वर्तमान में मैं काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में परास्नातक कर रही हूँ। कविता और संस्मरण लिख रही हूँ। भविष्य में पितृसत्ता और स्त्री विमर्श की तहों को खोजने के लिए प्रयासरत हूँ।
Bahut sunder likha hain... yeah padkar nainital mai bitaye har din yaad aa gaye...or sch mai nainital ko bhula pana bhut mushkil hain