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शहर कहाँ बसता है?

4 days ago
12 min read

First Position - Hindi, Writing Contest 2026

By Arun Vijay

City: Tilhar, Uttar Pradesh


तिलहर को एक लाल बिजली के खंभे की नज़र से देखिए, एक ऐसा खंभा जो तीस साल से एक ही तिराहे पर खड़ा है और इस कस्बे को बदलते हुए देखता आया है। उसके सामने बरगद और मजार गायब हो गए, मैदानों की जगह दीवारें खड़ी हो गईं, पुरानी लाइब्रेरी और टॉकीज़ बंद हो गईं। फिर भी कुछ चीज़ें बची हैं, पीरगाह तालाब, पुरानी मीनारें, बरूले की खुशबू और वे लोग, जो दूर चले जाने के बाद भी लौटते रहते हैं।

एक लड़का जब अपने कस्बे में लौटता है, तो उसके साथ लौटती हैं वे जगहें जो अब वहाँ नहीं हैं। यह तिलहर की उन्हीं जगहों, यादों और बदलते हुए चेहरे की कहानी है, एक छोटे कस्बे की, जो नक्शे पर भले छोटा हो, लेकिन अपने लोगों के भीतर बहुत बड़ा है। और शायद इसी लिए वह लाल खंभा अब भी इंतज़ार करता है और कहता है, “आप आयेंगे तो मैं आपके लिए उस दिन नई रोशनी जलाऊँगा।

Image: Author
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शहर कहाँ बसता है? सामने स्टेशनरी की दुकान में नक़्शे रखे हैं। क्या नक्शे पर उँगली रख देने भर से बता सकते हैं ये वो शहर है जहाँ मैं हूँ? नहीं हो पाता। मैं ख़ुद ही देर तक अचंभे से देखता रहता हूँ कि बस इतना सा है मेरा शहर? नक़्शे पर बना एक निशान और कुछ अक्षर। जबकि अपने भीतर देखो तो शहर बहुत बड़ा मालूम होता है। तब उँगली, उँगली तो हैं नहीं – तो अपनी लाइटें अपनी तरफ़ उठ जाती है। मेरी देह जैसे एक पूरा नक्शा हो। और उस पर पड़े निशान वो दरवाज़े जिनके ज़रिए शहर में वापस लौट सकते हैं! लेकिन हम कौनसे शहर वापस लौटते हैं? 


सामने बहुत देर से एक लड़का मुझे देख रहा है। कोई उससे पूछता है कि कौनसे शहर से हो तो कह देता है छोटे शहर से हूँ। और तब बात शुरू होती है – 

  •  छोटा शहर मतलब? कितना छोटा? 

  • जी, अगर आप दिल्ली से लखनऊ की तरफ़ जाने वाले हाईवे से गुज़र रहे हों और ठीक बीच में आपकी आँख 2 मिनट को लग जाये, उतने में आँखों के किनारे से गुज़र जाएगा। इतना छोटा शहर। 

  • तो कस्बा कह लो! 

  • हाँ कस्बा ही है। जहाँ ना मॉल हैं, ना सिनेमा हाल हैं। और... 


वो सोचता है – अगर वो लौटना चाहे तो कहाँ लौटेगा? उस कस्बे में जिसकी याद पसीने की तरह वो अपने देह पर लिए घूमता है या उस क़स्बे में जो अब दूसरे शहरों की नक़ल करने में बदलता जा रहा है!! और उससे बात करना उस लड़के के लिए दिन ब दिन मुश्किल होता गया है।


मैं खड़ा रहता हूँ। जबसे लगा हूँ। इस लड़के के यहाँ इस शहर में आने से बहुत पहले। लड़का 28 का हो गया है। मैं 30 का होऊँगा। जब लगा था मेरी लोहे की देह पर लाल रंग पोता गया था। अब भी लाल है लेकिन जंक का लाल। वो लोग मुझे तिराहे वाला लाल खंबा कह देते हैं। जिसकी लाइटें अनगिनत बार बदल दी गई हैं। पर हर तीसरे दिन जलती सिर्फ एक है। कहते हैं मेरा फ्यूज उड़ा हुआ है। मैंने किसी को नहीं बताया कि मैं रोज़ नई लाइट जलाता हूँ। जिससे बाक़ी तीन को आराम मिल सके। खैर, बात क़स्बे की है। अब कस्बे में देखता हूँ दूरी महसूस होती है। लड़का कभी कभी मेरी देह पर हाथ रखकर पूछ लेता है कि कैसा हूँ? तब लगता है पूरी कहानी कही जायें। 


इससे ज़्यादा मैं एक खंबा होकर क्या ही कह सकता हूँ? आप ख़ुद ही यहाँ आकर देख लीजिए। आप आयेंगे तो मैं आपके लिए उस दिन नई रोशनी जलाऊँगा। मेरा वादा है।

मैं जिस शहर का हूँ – वहाँ बाई-रोड लौटें तो हाईवे के पास से ही एक रास्ता अंदर के लिए कटा है। उस जगह को तिराहा कहते हैं। एक वक़्त था जब तिराहे पर लोगों के जाने का मतलब होता था –पीर बाबा की मजार को देखना, घने बरगद के नीचे सुस्ताना। सामने रोड क्रॉस करके काली माता मंदिर में लगे हैंडपंप से ठंडा पानी पीते लोगों को देखता था तो लगता था मैं पानी पी रहा हूँ। हमारे यहाँ बस स्टेशन कभी नहीं रहा। जिसको भी बाहर जाना होता वो यहीं तिराहे पर आता। लखनऊ और दिल्ली दोनों तरफ़ जाने वाले लोग मज़ार के पास बरगद के नीचे ही बैठे मिलते। दूसरी तरफ़ अगर बस आती तो उनके रोड क्रॉस करने का इंतज़ार कर लेती। लोग उठते, कपड़े झाड़ते, दुआ सलाम करते। एक बार माथा टेक लेते और फिर बस चढ़ते।


बहुत बार घरों में जब रिश्तेदार आए होते और तब मेरे शहर के लोगों का मन नहीं होता कि मेहमान जायें तो लोग तिराहे तक उन्हें छोड़ने आते। मेरे पास एक बरगद हुआ करता था। उसकी छाया में बैठे मैं लोगों को पीर बाबा और सामने काली माता के मंदिर में दुआ माँगते देखता कि आज बस ही ना आए। बहुत मुरादें पूरी हुई। बहुत नहीं भी। पर लोगों के पास कड़ी धूप में ठंडी छाया में बैठने का सुख हमेशा रहा। 


अब जब लड़का तिराहे पर लौटता है तो उसकी आँखें लगातार उस जगह को खोजती रहती हैं जहाँ बरगद और मजार हुआ करती थी। अब उसकी जगह धूप में जलती नंगी पक्की सड़क है। अब 6 लेन हाईवे बन गया है।। ना मजार बची है। और ना छाया। सामने काली माता मंदिर भी तोड़ दिया गया। सिर्फ़ मूर्ति बची है। हैंडपंप उखाड़ कर कहाँ ले गए पता नहीं – पर जगह देखकर प्यास अभी भी लगती है! मेरी प्यास तो लगातार ही बनी रहती है। 


अब लोग अपनी अपनी तरफ़ ही खड़े रहते हैं। जिसे दिल्ली जाना है वो दिल्ली की तरफ़। जिसे लखनऊ जाना है वो लखनऊ की तरफ़। धूप में जलते हुए। अगर गलती से दूसरी तरफ़ खड़े हैं तो बस इंतज़ार नहीं करती। ये जैसे नियम है। 


उस लड़के का घर तिराहे के पास ही है। वो कहता है – कि घर पहुँचने पर उसके घरवाले पूछ लेते हैं कि ट्रेन से क्यों नहीं आया! जी हाँ, यहाँ एक ट्रेन स्टेशन भी है। उदास सा। जहाँ 5 ट्रेन रुकती हैं। 2 दिन, 2 रात और एक सुबह। दवाई की तरह। दिन तो ठीक भी है, रात में जब ट्रेन रुकती है तो बड़ा भूतिया माहौल बनता है। क्यूँकि अभी तक भी सिर्फ 1 ही बल्ब जलता है। और रात में स्टेशन के बिल्कुल पड़ोस के सालों पुराने पॉपलर के जंगल सायें सायें कर हिलते हैं। उनकी छाया बल्ब की रोशनी में बड़ी होकर पूरे स्टेशन को ढक लेती है। तब लगता है - किस बियाबान में आ गए? यहाँ इंसान रहते भी हैं? और तब अचानक से, अगर किस्मत अच्छी हुई, तो इक्का दुक्का लोग दिख जाते है, ट्रेन का इंतज़ार करते हुए। 


अच्छे लोग हैं। अंधेरे में उतरेंगे तो दुआ सलाम करेंगे। पूछ लेंगे कि कहाँ से आए हैं, कहाँ जाना है? कह देंगे, कि आगे चौराहा आयेगा, वहाँ से रिक्शा मिल जाएगा। कोई चुटकुला सुना देंगे नहीं तो हँसी वाली कोई तो बात कर ही देंगे। तब सायें सायें के बीच में हँसी तिरती जाती है और ढाड़स बँध जाता है कि अपना ही घर है। तब जंगल उतना डरावना नहीं लगता। 


लेकिन अभी पिछले अक्टूबर को एक बात हुई। इसी स्टेशन पर। लड़का मुंबई में था। उसके दोस्त ने फ़ोन लगा दिया। दिया। वीडियो कॉल। और स्टेशन के पास की जगह दिखाने लगा। वो दोनों चुप थे। वीडियो देखते- देखते रो रहे थे। असल में जंगल काटा जा रहा था। बियाबान नहीं रहा। अब वीराना कहना ठीक होगा। स्टेशन पर अब उतरेंगे तो बल्ब हिलेगा नहीं। सायें सायें की आवाज़ भी नहीं होगी। अब बिना किसी से बात किए ही पता चल जाएगा कि कस्बे में उतरे हैं। बस्ती की रोशनी सामने दिखने लगेगी। ये सिर्फ़ अंदाज़ा है क्यूंकि ना तो मैं स्टेशन गया हूँ और ना ही लड़का। सुना है अब रात में भी स्टेशन पर खूब रोशनी रहती है।


तबसे वो लड़का बार बार बस से ही लौटता रहता है। तिराहे पर। मेरे पास। और मुझे एक बार देखकर पैदल ही घर की तरफ़ चल पड़ता है। 


पैदल चलें तो तिराहे से आधा किलोमीटर दूर जाकर उसका घर पड़ता है। घर से 100 मीटर पहले मिलती है बड़ी मस्जिद। बड़ी मस्जिद की ख़ास बात ये है कि गुरुवार को वहाँ मुस्लिम से ज़्यादा हिंदू चादर चढ़ाने आ जाते हैं। मतलब आ जाया करते थे। दूसरी बड़ी बात है बड़ी मस्जिद की दो ऊँची ऊँची मीनारे हैं। 13 मंजिल जितनी ऊँची। डेढ़ सौ साल पुरानी। ककयिया ईंट (पतली, छोटी ईंट) से बनी। उर्स के वक्त उस पर सुनहरी झालर डाल दिया करते थे। और वो रातों में जलती थी तब पूरी मीनार सुनहरी लगती थी। मैं तिराहे से ही उसे देखा करता था। और सोचता था कि क्या मैं उसके बराबर हूँ? नहीं। मैं कितना भी ऊँचा हो जाऊँ – आस्था से ऊंचा थोड़ी ना हो जाऊँगा। लड़का भी सोचता था कि एक दिन इसके भीतर चढ़ेगा और उससे पूरे तिलहर को देखेगा। 




पर तीन साल पहले मीनारों पर टाइल लग गए हैं। सफेद चिकने टाइल। उनमें अंदर से ही बल्ब फिट कर दिए हैं। सफेद बल्ब। अब वैसे ही लोगों का छत पर सोना कम होता है, और उर्स के दौरान सो भी जाओ तो उस तरफ़ देखने का मन नहीं करता। ना ही मीनार पर चढ़ने का मन करता है। और अब मैं सोचता हूँ कैसे किसी को यकीन दिलाऊँ कि ये सौ साल पुरानी मीनार है?


बड़ी मस्जिद क्रॉस करेंगे तो मदरसा मिलेगा। एक छोटे से खुले मैदान में। उसी मैदान में उर्स का मेला लगता है। और होलिका दहन भी वहीं होता है। क़व्वाली भी वहीं होती है। कभी कभी कचहरी जैसी चीज़ें भी देखने को मिल जाती है। और ठीक उसके पीछे एक गली है जिसमें सिर्फ़ मोटरसाइकिल ही जा सकती है। उसी गली में उस लड़के का घर है। 


शायद मैंने बता दिया है कि लड़के और मेरे क़स्बे का नाम तिलहर है। बहुत से नक्शों में आपको ये नाम कहीं नहीं मिलेगा। इसका अपना सुख है। 


कहते हैं तिलहर पहले तिलियारगढ़ हुआ करता था। यहाँ तीर बना करते थे। फिर तीर बनने बंद हो गए, नाम छोटा होता गया, सड़कें चौड़ी होती गई और ये तिलहर बन गया। तिलहर में नदी नहीं है। पर तालाब हैं। जो दो संतरी की तरह दोनों छोर से तिलहर को घेरे रहते हैं। एक छोर पर है पीरगाह तालाब। जिसमें सिंघाड़े की खेती होती है। उसके बारे में आपको कहानी सुननी है तो किसी भी 12 साल तक के बच्चे को पकड़ लीजिए और वो विद्या माता की कसम खाकर बता सकता है कि पीरगाह तालाब में 7 कुएँ हैं और एक हाथी उसमें अपना दम तोड़ चुका है। और इंसानों को डूबते तो उसने ख़ुद अपनी आँखों से देखा है। लॉकडाउन के बाद इस क़सम में एक और बात जुड़ गई है कि आगे चलकर इसी तालाब में वाटर पार्क बनेगा। ये भी एक बात है कि पीरगाह तालाब का पानी मुश्किल से ही दिखे। क्यूंकि या तो उस पर कायी तैरती रहती है या फिर सिंघाड़े की फसल। तो पीरगाह तालाब याद करते ही सब हरा नजर आता है। 


ठीक इससे उल्टा दूसरे छोर पर दूसरा तालाब है जिसका पानी हर वक्त दिखता रहता है। मिट्टी रंग का। उसमें मछली पाली जाती है। 9वीं के बाद की लड़के की पढ़ाई वहीं पास के स्कूल में हुई है। तो जब वो स्कूल जाया करता था तब तालाब के पास से एक महक उठा करती थी। जिसको ना सूंघने के लिए लड़का साँस बंद करके साइकिल पर बहुत तेज पैडल मारने लगता था। 


मछली अभी भी पालते हैं लेकिन अब महक नहीं आती। लड़के ने मोटरसाइकिल रोककर देखा है। सूँघा है। और उस मायूसी को मुझसे कहा है। 


अच्छा, स्कूल जाने के रास्ते में बाजार पड़ता है। तिलहर का इकलौता बाज़ार। ठीक चौराहे पर। चौराहे की ख़ास बात। पूरे कस्बे में चौड़ी सड़के हैं। दो दो लेन की लेकिन तब भी बाजार के चौराहे पर अगर दो गाड़ियाँ एक साथ निकलने की कोशिश करें तो इतनी जगह ही मिलेगी कि मजबूरन कुछ देर ठहरकर दोनों को बात करनी ही पड़ेगी। पीछे से चिल्ल पौं होता रहेगा। वहाँ दिन में दो बार जाम लगना नियम जिसका पालन यहाँ के लोग पूरी ईमानदारी से करते हैं। 


चौराहे के ठीक पड़ोस में नगर पालिका है। जिसका ग्राउंड एक समय पर सबके खेलने के लिए खुला रहता था। ग्राउंड के किनारे पर गांधी जी की मूर्ति हुआ करती थी जिसके इर्द गिर्द हम लोग मंडराते रहते थे। क्रिकेट हुआ करता था। बहुत से लड़के नगर पालिका की टूटी दीवार को पारकर अंदर आ जाया करते थे जिससे बाजार से घूमकर ना आना पड़े। 


अब दीवार पक्की हो गई है। क्रिकेट नहीं होता। नगर पालिका ग्राउंड बंद कर दी गई है। जैसे और भी मैदान बंद कर दिए गए हैं। एक टाइम पर, यहाँ 7 बड़े मैदान थे। और हर जगह तरह तरह के लोग मिल जाते थे। क्रिकेट, बॉलीवॉल, टहलना, बैडमिंटन, गप्पे हांकते लोग दिख ही जाते थे। कोनों से धुआँ भी उठता रहता था। जिसके पास जाने से सख़्त मनाही थी। इन्ही ग्राउंड पर दिसंबर में इतना कोहरा छा जाता था कि अपना हाथ दिखना मुश्किल हो जाता था। तब इन मैदानों में दौड़कर कोहरा पी लेने का अपना ही सुख था। अब दीवारे हैं तो उस सुख की याद में लोग खाँस लेते हैं। 


हाई स्कूल से पहले लड़का जिस स्कूल में पढ़ता था वो आर्य समाज का स्कूल था। वहाँ एक कोठरी थी जिसमें पंडित राम प्रसाद बिस्मिल का फोटो था। और बच्चों को उनकी गाथा सुनायी जाती थी कि एक बार अंग्रेज़ों से बचने के लिए राम प्रसाद बिस्मिल उसी कोठरी में आकर छिपे थे। अपने और साथियों के साथ। लड़का कहता है उसे बस एक ही बार उस कोठरी के दर्शन हुए। फिर कभी नहीं। अभी भी स्कूल के पास गुज़रता है तो लड़का पुराने बूढ़े गार्ड से पूछ लेता है कि स्कूल सलामत है ना। वो भी हाथ उठा कर कह देते हैं – कि जिस दिन मैं जाऊँगा उसी दिन स्कूल भी जाएगा। वो हँसते हैं। लड़का भी हँसने की एक्टिंग कर लेता है।


ये बीते हुए की महक तिलहर में बहुत जगह मिल जाती है। एक स्कूल है जो 1917 से चल रहा है। उसकी दीवारें तब की बनी थी, फिर तोड़ी गई, फिर जोड़ी गई, हाँ वहाँ की लाइब्रेरी में पीली सीलन लगी किताबें थी जो लड़के के पापा गर्मियों की छुट्टियों में घर ले आया करते थे। चंद्रकांता उसने वहीं से पढ़ी है। सुरेंद्र मोहन पाठक के उपन्यास भी। फिर जब उसके पापा ने एक बार पढ़ लिए तो फिर दोबारा कभी उसे तो पढ़ने को नहीं मिले। एक समय पर कई साइकिल वालों के पास कॉमिक्स किराए पर मिल जाया करती थी। और लड़के के घर पर पढ़ने की मनाही थी तो छिपकर पढ़ता था। मैदानों में जाकर। फिर पढ़ना कम हो गया। साइकिल की दुकानों को अतिक्रमण कहकर किनारे हटा दिया गया। वो लाइब्रेरी ख़त्म हो गई। 


अब कोई लाइब्रेरी नहीं है। कोई किताब नहीं मिलती। चौराहे पर एक दुकान थी जो 5 रुपए वाली कहानियों की किताब दिया करता था। भूत की कहानियाँ, राजा रानी की कहानियाँ, हितोपदेश के किस्से, नटखट कहानियाँ – वो किताबे जो रद्दी के कागज पर मिलती थी। अब वो दुकान बंद हो गई है ताला पड़ा रहता है। सुना है फ़ोन का कोई शोरूम खुलेगा वहाँ। तो एक बार वहाँ से गुज़रते हुए नज़र डाल लेता है। और तब अफ़सोस करता है कि उसने अपनी कहानियों की किताब का बोरा क्यों बेच दिया! 


और बेचकर किया भी क्या? बरूले खाये थे। बरूले! आलू को छोटा छोटा काटकर उसको तेल में भून लेते हैं। और फिर धनिया, पुदीना और आम की चटनी के साथ मसाला डालकर खाते हैं। कहते हैं बरूले। कुछ लोग आलू पर अरारोट की परत भी चढ़ा देते हैं। तो उसके चलते तिलहर में बाकायदा 5 तरह के बरूले खाने को मिल जाएँगे। तिलहर में आलू के शौकीन लोग हैं। आलू की ही चीज़ें गिने तो बहुत होंगी – बरूले, आलू की टिक्की, आलू की चाट, लाल वाले आलू, लाल कढ़ायी वाले आलू, आलू चाप, आलू पकौड़ी... और ये सब आपको शाम के वक्त ठेलों पर बाजार में मिलेंगी।


एक और स्कूल है जो अंग्रेजों की बनायी गई पुरानी इमारत में अभी भी चलता है। वहाँ कभी अस्पताल हुआ करता था। फिर उसमें स्कूल बन गया। उसकी ईंटें अभी भी 100 साल पुरानी हैं। उनको छूने के लिए लड़का अक्सर दिनों में भाग जाता था।  और कई लड़के ईंटों को बीनकर अपने घर ले आया करते थे। उनको देखने का अजीब कौतुहल था! 


अच्छा तिलहर में मॉल नहीं हैं और ना ही सिनेमा हॉल हैं। दो टॉकीज़ हैं। राधा टॉकीज़, उमा टॉकीज़। राधा टॉकीज़ में बहुत पहले एक फ़िल्म लगी थी। जिसे लड़के ने देखा था। उसके पहले और बाद में उस टाकीज के चलने का ज़िक्र उसने और मैंने कभी नहीं सुना। ऐसे ही उमा टॉकीज़ बीच के कुछ सालों में चली। जिसमें बी ग्रेड फ़िल्मों से इतर थोड़ा सा सबका ध्यान रखते हुए फिल्में लगी – लड़के ने तब सिंघम, धूम 3 फिल्में उसमें देखी हैं। लेकिन अब वो भी नहीं। अब वहाँ पार्किंग बन गई है। 


ऐसे ही एक और स्कूल है जिसकी इमारत बहुत पुरानी है। बाबू बुलाकीदास स्कूल। उसके पीछे लड़कियों का हॉस्टल है और कहावत है कि रात के वक्त उस हॉस्टल के एक कमरे से उस लड़की के रोने की आवाज़ आती है जिसने उसमें आत्महत्या की थी। इसलिए उस कमरे पर ताला पड़ा रहता है। 


जब भी कोई तिलहर आता है तो लड़का उसे ये सब जरूर घुमाता है। मेरे पास लाता है। मेरी देह पर हाथ रखकर कहता है - कि मैं उससे भी पुराना हूँ। बाक़ी इस क़स्बे में और कुछ ख़ास नहीं हैं। सब कुछ इतना सामान्य है कि लोगों को नींद बहुत आराम से आ जाती है। और अगर आप आ भी गए तो होटल तो है नहीं, आपको या तो किसी अपने के घर रुकना होगा या फिर... दूर जाना होगा। असल में मैंने देखा है, तिलहर ठहरने की जगह है। सारे कुछ से जुड़कर भी सारे कुछ से अछूता। जो बात मैं हमेशा दूसरों को बताता रहता हूँ वो ये कि हमारे यहाँ राम लीला बारात में ख़ान बैंड, यूसुफ बैंड और पाकीज़ा बैंड शिरकत कर रहा होता है। ख़ान भाई राम बारात के सबसे आगे चलते रहते हैं और दुआ देते जाते हैं। जब बहुत से मंदिर मस्जिद के फैसले आ रहे थे तब लड़का अपने मुस्लिम दोस्तों के घर बैठा हुआ तहरी खा रहा था और बात कर रहा था कि अस्पताल, स्कूल के लिए भी तो हम लड़ सकते थे? 


इससे ज़्यादा मैं एक खंबा होकर क्या ही कह सकता हूँ? आप ख़ुद ही यहाँ आकर देख लीजिए। आप आयेंगे तो मैं आपके लिए उस दिन नई रोशनी जलाऊँगा। मेरा वादा है। 


लेखक के बारे में:

अरुण विजय

अरुण विजय (1998) अपने शहर तिलहर से निकलने के बाद घर की तलाश में कहानी, अभिनय और नाटकों में यात्रा करते रहते हैं। इस यात्रा में कहानियों की किताब - रोशनी, छिपकली और पतंगा; हिंदयुग्म पब्लिकेशन से जनवरी 2026 एक घर बना। Birtha Mauthews, Supposed to be a Joke, आरम्भ जैसे नाटकों में भी घर ढूंढा। हैदराबाद विश्वविद्यालय से theatre arts में मास्टर्स करने के बाद से अभिनय और कहानी की दुनिया में जगह बनाते हुए भटकते मिल जाएँगे। इन दिनों Ektara के साथ बच्चों के लिए लिखना सीख रहे हैं.



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