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रेल गाड़ी

5 days ago
6 min read

Special Mention, Hindi, Nāgrika Youth Writing Contest 2026

By Ananjay Sharma

City: Gwalior, Madhya Pradesh


सूनी पड़ी पटरियों पर कान लगाइए तो ग्वालियर की पुरानी कहानी सुनाई देती है। सवा सौ बरस पुरानी "दो फुटिया" नैरो गेज ने राजाओं का दौर, आज़ादी और शहर की बदलती रफ़्तार, सब देखा है। तानसेन के सुर, जलेबी की मिठास, बागियों के किस्से और बंद होते कारखानों के बीच वह कहती है: शहर बदला ज़रूर, पर उसकी खुशबू कम नहीं हुई, और गहरी होती गई।


बंद हो चुकी नैरो गेज रेलगाड़ी की सूनी पड़ी पटरियों की नज़र से मैं दो फुटिया हूं। मध्य प्रदेश के प्राचीनतम शहरों में से एक ग्वालियर में आजकल कहीं पर खुली तो कहीं कूड़े-कचरे में दबी नैरो गेज रेलवे की पटरी। मेरे आने के बाद पहले मीटर गेज और फिर ब्रॉड गेज लाइन आने पर मुझे 2 फुटिया नाम दे दिया गया क्योंकि मीटर गेज और ब्रॉड गेज लाइन की पटरियां तो काफी चौड़ी होती हैं और मैं थी सिर्फ 2 फुट चौड़ी। वरना इससे पहले तो तकरीबन 50-60 बरसों तक मुझे महाराजा वाली रेलगाड़ी कहा जाता था। 


मैंने अपने जन्म के बाद तकरीबन सवा सौ बरसों में खुद को ही नहीं इस ग्वालियर शहर को भी काफी बदलते हुए देखा है, कभी खुली तो कभी बंद आंखों से। ग्वालियर से शिवपुरी, ग्वालियर से भिंड, श्योपुर, सबलगढ़ के लिए मैं 100 बरसों तक आम लोगों और सामान को ढोती रही। इन 100 बरसों में नैरो गेज ट्रेन चलाने वालों और मुसाफिरों की कई पीढ़ियां आई और ग्वालियर शहर भी कहां से कहां पहुंच गया। एक वक्त जो रेलवे स्टेशन सिर्फ मेरी वजह से था, मेरे लिए बनाया गया था, बाद में मुझे एक किनारे के अलग-थलग प्लेटफार्म पर शिफ्ट कर दिया गया। और फिर वो दिन भी आ गया जब कभी आबाद रहने वाली 2 फुट चौड़ी पटरियां सूनी हो गईं और रेलगाड़ी चलनी बंद। आज 2 फुटिया भले ही अपने हाल पर रो रही हो शहर तो अपने बदलाव पर और तरक्की पर खूब खुश हो रहा है। 


  जिनको आप 2 फुटिया कहते हैं ना उन्होने अंग्रेजों का राज देखा, सिंधिया परिवार की राजशाही देखी और फिर 1947 के बाद से लोकतंत्र। मुझे याद है शुरू में जब शहर में पतली गलियां और संकरी सड़कें थीं तो उनमें से लोग पैदल या फिर घोड़ा तांगे में बैठकर स्टेशन आते थे, नैरो गेज ट्रेन में सफर करने के लिए। बाद में साइकिल आई, मोपेड आई, तरह-तरह के स्कूटर आए और अब तो शहर छोटी ट्रेन के एक डिब्बे के बराबर देह वाली गाड़ियों से भर गया है। पहले ग्वालियर शहर की पटरियों से जब ट्रेन गुजरती थी तो मुझे गुदगुदी सी होती थी, लेकिन अब जब ये बड़ी गाड़ियां बिना किसी अनुशासन के पटरियों से सायं सायं करती हुई निकल जाती हैं तो दर्द का अहसास होता है। 


  एक समय था जब छोटी पटरियों से ट्रेन गुजरती थी तो शहर में जो भी थोड़ा बहुत ट्रैफिक होता था थम जाता था। लेकिन ट्रेन भी इतनी इंसानियत रखती थी कि बिना गेट वाली क्रॉसिंग पर कोई गाय या बकरी आ गई तो ड्राइवर ट्रेन रोककर पहले उसे हटाता था फिर गाड़ी आगे बढ़ती थी। इस दौरान कुछ सवारियां भी हल्की हो लेती थीं। आसपास के इलाकों में जाने के लिए लोग घंटों तक नैरो गेज रेलगाड़ी का इंतज़ार करते थे लेकिन अब तो सड़कों और बड़ी गाड़ियों का ऐसा जाल बिछ गया है लोग पलक झपकते अपनी मंज़िल पर पहुंच जाते हैं। देखते-देखते ग्वालियर स्टेशन पर 4-5 प्लेटफार्म हो गए हैं और अभी बढ़ ही रहे हैं। आजकल स्टेशन के नवीनीकरण का काम चल रहा है। लोग कह रहे हैं कि नया स्टेशन बिल्कुल एयरपोर्ट जैसा बन रहा है। 


  मैंने बरसों तक रेलगाड़ी की खड़खड़ और सितार और वीणा की धुनों पर पक्के राग एक साथ सुने हैं। मैं आपको बता दूं कि ग्वालियर की जितनी पुरानी पहचान नैरो गेज लाइन है उससे कहीं बड़ी और पुरानी पहचान ग्वालियर के संगीत की है। पंडित तानसेन का नाम तो आपने सुना ही होगा, वो ग्वालियर के ही थे। उनकी समाधि पहले तो शहर से बाहर पड़ती थी लेकिन अब तो वो शहर के बीचों बीच आ गई है। ग्वालियर संगीत घराना इकलौता है जिसने गायन की दो शैलियां दी हैं ख्याल और ध्रुपद। संगीत में इतने उतार-चढ़ाव आए लेकिन मैंने ग्वालियर की शास्त्रीय संगीत परंपरा को कभी डगमगाते नहीं देखा। सरोद के उस्ताद अमजद अली खान ग्वालियर के हैं यह तो सबको पता ही है। ग्वालियर मेले में होने वाले संगीत समारोहों में आजकल तो कलाकार अपनी गाड़ियों में आते हैं, लेकिन एक वक्त था जब वो या तो तांगे से आते थे या नैरो गैज पकड़कर मेले के सामने बने स्टेशन तक का सफर करते थे। 


ग्वालियर में पढ़ने वाले बहुत से छात्र हमेशा से ही आसपास के इलाकों से भी आते रहे हैं। आजकल  तो ज़्यादातर के पास बाइक है लेकिन एक वक्त था जब वो नैरो गेज का इंतज़ार करते थे। मुझे कई छात्र याद है जो विक्टोरिया कॉलेज आते जाते थे। यह कॉलेज 1846 में बना था अब तो सुना है कि इसका नाम बदलकर महारानी लक्ष्मीबाई कॉलेज कर दिया गया है। खास बात बताऊं भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी इसमें पढ़ते थे और उन दिनों इसके प्रिंसिपल डॉक्टर शिवमंगल सिंह सुमन हुआ करते थे। फिल्मी जगत की मशहूर हस्ती जावेद अख्तर के पिता जहां निसार अख्तर भी इसी कॉलेज में पढे। हालांकि बाद में वो आगे की पढ़ाई के लिए अलीगढ़ चले गए। इस कॉलेज के पास बने अचलेश्वर मंदिर का उल्लेख किए बिना ग्वालियर के बदलाव की कहानी अधूरी रह जाएगी। पहले छोटी सी जगह में ही स्थापित शिवलिंग ने आज एक विशालकाय मंदिर का रूप ले लिया है।  


ग्वालियर की असल खुशबू यहां के खाने-पीने में भी है जो वक्त के साथ बदलते रहे हैं। शुरुआत में नैरो गेज के स्टेशनों पर या रास्ते के स्टेशनों पर भजिए और मंगोड़े का चलन था। लेकिन 30-40 साल पहले ग्वालियर में पोहा आया और छा गया। ग्वालियर की रियासत के शासक मराठा थे, शहर में बहुत से मराठा परिवार रहते थे और उनके घरों में पोहा बनता था लेकिन तब दुकानों पर नहीं मिलता था। लेकिन अब तो सुबह के वक्त हर दूसरा ठेला पोहे का ही नज़र आता है। सुबह के नाश्ते से भजिए हट चुके हैं और उनकी जगह बेड़ई ने ले ली है जिसका मायका आगरा है। इस बीच में तरह-तरह की मिठाई आ गई हैं लेकिन ग्वालियर के लोग इमरती और जलेबी के बिना नहीं रह सकते हैं। ये बात बड़ी मशहूर है कि ग्वालियर के लोग जलेबी कभी भी खा सकते हैं, ऐपेटाइजर की तरह भी और पाचक की तरह भी। 


संगीत और खान-पान के साथ ही मैंने ग्वालियर के साहित्य की महक को भी पूरे देश में फैलते और सम्मान पाते देखा है। नाम तो अब ऐसे याद नहीं पड़ते हैं लेकिन इतना ज़रूर याद है कि इनमें से बहुत से लोग नैरो गेज से आते-जाते रहे हैं। निदा फाज़ली साहब ग्वालियर में ही पले-बढ़े। 1965 में उनके माता-पिता और परिवार के दूसरे सदस्यों ने पाकिस्तान जाने का फैसला ले लिया लेकिन निदा फाजली साहब को ग्वालियर इतना पसंद था कि वो उनके साथ नहीं गए। हालांकि बाद में ग्वालियर से मुंबई शिफ्ट हो गए लेकिन ग्वालियर के साथ उनका नाता बना रहा। 


ग्वालियर के संगीत की तरह ही ग्वालियर के कल कारखानों का नाम भी फैलते हुए मैंने देखा है। ग्वालियर में हमेशा से बड़े-बड़े कारखाने रहे हैं। अब कुछ पुराने भले ही बंद हो गए हों लेकिन ग्वालियर ग्रेसिम, जीवाजी क्लॉथ मिल, सिमको और जेबी मंघाराम का नाम तो दुनिया भर में खूब था। जेबी मंघाराम के बिस्किट टिन के डिब्बों में आते थे और विदेशों तक जाते थे। मोपेड बनाने का देश का पहला कारखाना विक्की फैक्ट्री मेरे ही सामने ग्वालियर में खुला और बंद हुआ। ग्वालियर पॉटरीज़ अब बंद है लेकिन एक वक्त था जब इसमें ब्रिटिश स्टाइल की क्रॉकरी बना करती थी। 


एक वक्त था जब नैरो गेज ट्रेन से सफर करने वाले लोगों में कई लोग बड़ी-बड़ी मूंछों वाले होते थे और राइफल लटकाकर रखते थे, मुंबई की फिल्मों में आने वाले डाकुओं जैसे। बेशक इनमें से कुछ दस्यु रहे होंगे, लेकिन हकीकत में ये साधारण से भी साधारण इंसान होते थे। फिल्मों में ग्वालियर चंबल के डाकुओं को बहुत खूंखार बताया जाता था। लेकिन नैरो गेज में सफर करने वाले जिन कई पूर्व डकैतों के बारे में मुझे पता है वो तो फिल्मों वाले डाकुओं से एकदम विपरीत थे। पुलिस के रिकॉर्ड में इनके नाम के आगे भले ही डाकू लिखा होगा लेकिन ये लोग अपने आप को बागी कहते थे और आम लोग इनको दद्दा। इनमें से ज़्यादातर दबंगों के अत्याचारों और सिस्टम से परेशान होकर बीहड़ों में कूदे। इनमें से बहुत से ऐसे बागी थे जिन्होंने कई गरीब लड़कियों की शादियां करवाई और ज़रूरतमंद परिवारों को सहारा दिया। एकदम रॉबिन वुड वाली छवि थी ज्यादातर की। 


जब आप ट्रेन से ग्वालियर आएंगे तो स्टेशन के बाहर पर एक छोटा सा इंजन रखा हुआ मिलेगा जो नैरो गेज में लगता था। ये इंजन पहले एक बड़े से कमरे में फूल बाग पर रखा हुआ था। वैसे यही वो इंजन है जो पहली बार ग्वालियर से शिवपुरी के लिए छोटी ट्रेन लेकर चला था। कहा जाता है कि जब पहली बार ट्रेन चली तो इंजन में साधारण लकड़ियों और कोयले के बजाय चंदन की लड़कियां इस्तेमाल की गईं और साधारण तेल की जगह चमेली का तेल। लोगों ने हाल -हाल के बरसों तक इंजन में वह खुशबू महसूस की है।


ग्वालियर में बहुत कुछ बदला है लेकिन इस शहर की खुशबू बदलाव के साथ बदली नहीं बल्कि और तेज होती चली गई। उम्मीद है ये सिलसिला बरकरार रहेगा। आमीन।


लेखक के बारे में:


Ananjay Sharma

Ananjay Sharma is a Product Manager at an IT company based out of Hyderabad. Despite having called multiple metro Cities in India his home, he reserves a special place in his heart for Gwalior, the place he considers his hometown. Despite the recent modernisation across the City, he remains particularly interested in capturing the vast history of the place and its people.


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