top of page

सरसैया घाट की सातवीं सीढ़ी

Oct 6
8 min read

Updated: Oct 7

Third Position, Hindi, Nāgrika Youth Writing Contest 2026

By Shivam Antapuriya

City: Kanpur, Uttar Pradesh


कानपुर के सरसैया घाट की सातवीं सीढ़ी की नज़र से देखिए एक बदलते शहर की दास्तान। यह सीढ़ी इंसानों को उनके चेहरों से नहीं, बल्कि उनके कदमों की आहट, प्रसन्नता और एड़ियों में उतरे दुख से पहचानती है। मिलों के सायरन गूँजने और उनके बंद होने के दौर से लेकर काकादेव और आईआईटी के नए सपनों तक, इसने कानपुर का पूरा इतिहास जिया है। लैम्पपोस्ट की पीली रोशनी से एलईडी के सफ़र, सेल्फी लेते युवाओं और घायल होती गंगा की पीड़ा के बीच, यहाँ आस्था और पीढ़ियों का अटूट रिश्ता है। यह कहानी है शहर के बदलते स्वरूप, आस्था और संरक्षण की।

Image: Author
Image: Author

भाग 1 


जहाँ हर सुबह कानपुर मेरे ऊपर से होकर गंगा में उतरता है, मैं वही सातवीं सीढ़ी हूँ।

लोग मुझे पत्थर कहते हैं। उन्हें क्या पता कि जो सबसे कम बोलते हैं, समय अपनी सबसे लंबी कहानी उन्हीं के भीतर लिखता है।


गंगा तक पहुँचने के लिए हर किसी को मुझ पर पैर रखना पड़ता है। कोई मुझे प्रणाम नहीं करता, कोई मेरा नाम नहीं जानता। वे आते हैं, मेरे ऊपर से उतरकर गंगा को नमन करते हैं और लौट जाते हैं। वर्षों तक मैं भी मौन रही, क्योंकि पत्थरों को बोलने की जल्दी नहीं होती।


घाट की पहली छह सीढ़ियाँ शहर की धूल अपने ऊपर रोक लेती हैं। मेरे पास पहुँचते पहुँचते लोगों की चाल बदल जाती है। कोई चप्पल उतारता है, कोई बच्चे का हाथ कसकर पकड़ लेता है। तभी मैं समझ जाती हूँ कि अब वे शहर से उतरकर आस्था की शरण में आ रहे हैं।


मनुष्य अपने चेहरे से कम, अपने कदमों से अधिक पहचाना जाता है। प्रसन्नता पाँव हल्के कर देती है और दुःख बिना बोले एड़ियों में उतर आता है।


मुझे अपना जन्म याद नहीं। किसने तराशा, किसने यहाँ स्थापित किया यह गंगा ही जानती होगी। पर जब से स्वयं को पहचानती हूँ, यहीं हूँ। ऋतुएँ बदलीं, पीढ़ियाँ बदलीं, शहर बदला, पर मेरी प्रतीक्षा कभी नहीं बदली। हर भोर मैं उसी धैर्य से कानपुर का इंतज़ार करती हूँ।


भोर मेरा सबसे प्रिय समय है। पूर्व दिशा में लालिमा फैलती है, गंगा अपनी रातभर की नीरवता खोलती है। हवा में भीगी मिट्टी, धूपबत्ती और तुलसी की मिलीजुली सुगंध तैरती है। मंदिर की घंटियाँ और मस्जिद की अज़ान एक ही हवा में घुलकर मेरे पास आती हैं। मैंने कभी उनमें भेद नहीं देखा।


सबसे पहले बूढ़े आते थे काँसे का लोटा, कंधे पर गमछा और होंठों पर गंगास्तुति। उनके पीछे स्त्रियाँ आतीं, जिनकी पायल की रुनझुन दूर से ही उनका परिचय दे देती। वे इतनी हल्के पाँव मुझ पर उतरतीं कि लगता मैं पत्थर नहीं, किसी पुरखिन का आँगन हूँ।


मैंने एक स्त्री को वर्षों तक देखा नई दुल्हन, फिर माँ, फिर अपने बच्चे का हाथ थामे, और अंततः उसी बच्चे के सहारे उतरती हुई। उसके बाल कब सफेद हुए, यह आईने ने जाना होगा; मैंने तो उसके कदमों से ही समय का बीतना पहचान लिया।

धीरे-धीरे सूरज चढ़ता और कानपुर अपनी रफ्तार पकड़ लेता। मिलों के सायरन गूँजते। युवक जल्दी-जल्दी स्नान कर काम पर निकलते। शाम को लौटते तो उनके कदमों में दिनभर की मेहनत उतर आती।


लोग लाल इमली, एल्गिन मिल, लक्ष्मी रतन और जाजमऊ की बातें करते। मैं कभी वहाँ नहीं गई, पर शहर स्वयं अपनी कहानियाँ लेकर मेरे पास आता रहा। मैंने जाना कि किसी शहर को समझने के लिए उसकी गलियों में भटकना आवश्यक नहीं, उसके लोगों के कदम ही उसका इतिहास कह देते हैं।


एक दिन नयागंज का व्यापारी आया। उसके कपड़ों से मसालों की खुशबू उठ रही थी। उसके जाने के बाद भी वह सुगंध देर तक मेरे भीतर बसी रही। तभी समझ में आया कि हर शहर की अपनी एक गंध होती है कानपुर की गंध उसके कारखानों, मसालों, पसीने, गंगा और मिट्टी से मिलकर बनी है।


बरसात में गंगा मुझे अपनी बाँहों में भर लेती। कई दिनों तक मैं जल में डूबी रहती। लोग उसे बाढ़ कहते, मैं उसे मिलन। पानी उतरने पर बच्चे मेरे ऊपर जमी मिट्टी में अपने नाम लिखते और अगले ही दिन वे नाम बह जाते। तब लगता, समय हर नाम को पानी में लिखता है।


सर्दियों में कोहरा, अलाव, कुल्हड़ की चाय और नाविकों की आवाज़ें मेरे साथी बन जातीं। शाम को लौटते लोग फूलबाग, परेड, बिरहाना रोड और कानपुर सेंट्रल की बातें करते। बिना कहीं गए मैंने पूरा शहर देख लिया।


मुझे लगता था कि यह सब हमेशा यूँ ही चलता रहेगा। मिलों के सायरन कभी नहीं थमेंगे।


लेकिन एक दिन मेरे ऊपर बैठे दो बूढ़ों की बातचीत ने मेरी नीरवता में दरार डाल दी।



भाग 2


उस दिन मेरे ऊपर बैठे दोनों बूढ़े बहुत देर तक चुप रहे। गंगा अपनी लय में बहती रही, पर उनकी आँखों में एक अनकहा धुआँ तैर रहा था। आखिर एक ने धीमे स्वर में कहा—"सुना है... मिल बंद हो गई।"


उसी क्षण मुझे पहली बार लगा कि शहर केवल बसते नहीं, कभी-कभी धीरे-धीरे उजड़ना भी शुरू कर देते हैं।


दूसरे ने उत्तर नहीं दिया। उसने केवल गंगा की ओर देखा। उसी मौन ने मुझे समझा दिया कि कभी-कभी किसी शहर का सबसे बड़ा शोर उसकी चुप्पी होती है। कारखानों के फाटक बंद होने का अर्थ केवल मशीनों का रुकना नहीं होता, बल्कि अनगिनत घरों की चूल्हों का बुझ जाना भी होता है।


धीरे-धीरे मैंने कदमों का भार बदलते देखा। जो युवक कभी काम पर जाने की जल्दी में दौड़ते थे, वे अब देर तक मेरे ऊपर बैठने लगे। उनके चेहरों पर मेहनत थी, पर भविष्य का भरोसा कम हो गया था। बातचीत में अब वेतन से अधिक 'छँटनी', 'बंदी' और 'रोज़गार' जैसे शब्द सुनाई देने लगे।


एक दिन जाजमऊ का एक आदमी आया। उसने गंगा का जल माथे से लगाया और भर्राए स्वर में बोला, "गंगा मैया... अब सब पहले जैसा कहाँ रहा?" उसके प्रश्न का उत्तर गंगा ने नहीं दिया। नदियाँ केवल बहती हैं, उत्तर समय देता है।


पर समय केवल छीनता ही नहीं। कुछ वर्षों बाद मैंने शहर की बातचीत बदलते देखी। अब कोई कहता, "लड़का काकादेव में पढ़ रहा है।" कोई गर्व से बताता, "हमारा बेटा आईआईटी निकल गया।" किसी के सपने अब मिलों से आगे बढ़ चुके थे। मुझे लगा, शहर का एक अध्याय समाप्त हुआ है, पर दूसरा आरम्भ भी हो चुका है।


घंटाघर अब भी खड़ा था, पर उसकी आवाज़ पहले जैसी साफ़ नहीं आती थी। इमारतें ऊँची हो गई थीं, सड़कें चौड़ी हो गई थीं और शोर बढ़ गया था। पुराने लैम्पपोस्ट की पीली रोशनी की जगह सफेद एलईडी ने ले ली थी। चेहरे अधिक स्पष्ट दिखते थे, पर लोग एक-दूसरे को कम पहचानते थे।


शहर का विस्तार लोगों की बातों से मेरे पास पहुँचता रहा। कोई गंगा बैराज की शामों की चर्चा करता, कोई नए बाज़ारों की। मैं मुस्कुरा देती। गंगा वही थी, सूरज वही था; बदले थे केवल उन्हें देखने के तरीके।


फिर एक दिन कुछ युवाओं ने स्नान से पहले गंगा की तरफ पीठ करते हुए अपनी तस्वीरें खींचीं। पहले लोग गंगा को देखने आते थे, अब गंगा के साथ स्वयं को भी देखना चाहते थे। मुझे इसमें कोई शिकायत नहीं हुई। हर पीढ़ी अपनी श्रद्धा को अपने समय की भाषा में व्यक्त करती है।


इन सब बदलावों के बीच एक चीज़ नहीं बदली  गंगा मेला। रंगों से भरे जुलूस, बच्चों की हँसी, ढोल की थाप और गंगा के प्रति वही अटूट आस्था। मैंने देखा, जो बच्चा कभी अपने पिता का हाथ पकड़कर आया था, वही वर्षों बाद अपने बेटे का हाथ थामे मेरे ऊपर उतर रहा था। वह मुझे पहचान नहीं पाया, पर मैंने उसे उसके कदमों से पहचान लिया।


बस एक परिवर्तन मुझे भीतर तक छू गया। पहले लोग मेरे ऊपर बैठकर देर तक बातें करते थे। अब वे जल्दी में रहते। मोबाइल देखते, तस्वीर लेते और लौट जाते।


मैंने गंगा से पूछा, "क्या लोगों के पास अब समय कम हो गया है?"

गंगा की लहर मेरे किनारे से टकराई और बोली, "समय उतना ही है, बस मनुष्य ने उसे बाँटना सीख लिया है।"

उस उत्तर पर मैं देर तक सोचती रही। फिर डूबते सूरज की लालिमा में मुझे लगा कानपुर बदल रहा है, पर उसकी आत्मा अब भी जीवित है। क्योंकि आज भी कोई माँ अपने बच्चे के माथे पर गंगा का जल लगाती है, कोई बूढ़ा मेरे ऊपर बैठकर चुपचाप प्रार्थना करता है, और किसी की आँखें श्रद्धा से भीग जाती हैं।


जब तक यह सब है, तब तक कोई भी शहर सचमुच बूढ़ा नहीं होता।


भाग 3  

संध्याएँ हमेशा से मुझे सुबहों से अधिक समझदार लगी हैं। सुबह मनुष्य आशा लेकर आता है, शाम अनुभव लेकर लौटती है। मैंने दोनों को बराबर देखा है, इसलिए जानती हूँ कि जीवन आगे बढ़ने से अधिक लौट आने का नाम है।

एक दिन डूबते सूरज की सुनहरी आभा में मैंने एक परिचित स्पर्श महसूस किया। कदम अब धीमे और काँपते थे, पर मैं उन्हें पहचान गई। वर्षों पहले यही बालक मेरे ऊपर दौड़ता हुआ उतरता था। आज वही वृद्ध होकर अपने छोटे से पोते का हाथ थामे मेरे पास आ बैठा।


पोते ने उत्सुकता से पूछा, "दादाजी, आप हर बार इसी सीढ़ी पर क्यों बैठते हैं?"


वृद्ध मुस्कुराया। उसने मेरी सतह पर हाथ फेरा और बोला, "बेटा, जब मैं तुम्हारी उम्र का था, तब मेरे बाबा मुझे यहीं लाते थे। मैंने पहली बार यहीं गंगा को छुआ था। तुम्हारे पापा ने भी यहीं तैरना सीखा। कुछ जगहें बदली नहीं जातीं, क्योंकि वहीं हमारा बचपन बैठा होता है।"


उसकी बात सुनकर लगा, मनुष्य स्थानों को याद नहीं रखता, स्थान मनुष्यों को याद रखते हैं। मैं आज भी उसे उसी स्पर्श से पहचानती हूँ, जिससे कभी उसका बचपन पहचाना था।


तभी मेरी दृष्टि गंगा पर गई। वही धारा थी, पर उसका रंग पहले जैसा निर्मल नहीं रहा। जल में अब फूलों के साथ प्लास्टिक की बोतलें, पॉलीथिन और पूजा की बची सामग्री भी बह रही थी। कभी-कभी दूर से आती नालियों का मैला जल उसकी साँसों को भारी कर देता था। मैंने वह समय भी देखा था जब लोग गंगा से जीवन माँगते थे, और यह समय भी देख रही हूँ जब अनजाने में उसी जीवन को घायल कर रहे हैं।


मैंने धीमे से गंगा से पूछा, "क्या तुम्हें पीड़ा होती है?"


गंगा मुस्कुराई.... उसकी एक लहर मेरे किनारे से आ लगी और बोली, "पीड़ा तो होती है, बहन... पर माँ अपने बच्चों से शिकायत कब करती है ? मैं आज भी उन्हें अपने जल में समेट लेती हूँ। बस यही चाहती हूँ कि एक दिन वे मुझे केवल पूजें ही नहीं, समझें भी।"


उस उत्तर ने मुझे भीतर तक भिगो दिया। मैंने सोचा, श्रद्धा तभी पूर्ण होती है जब उसमें संरक्षण भी जुड़ जाए।

इसी बीच एक छोटा सा बालक अपने पिता का हाथ छुड़ाकर दौड़ा। उसने किनारे पड़ी प्लास्टिक की बोतल उठाई और पास रखे कूड़ेदान में डाल दी। उसके पिता ने मुस्कुराकर उसके सिर पर हाथ फेर दिया। उस क्षण मुझे लगा कि आशा अभी समाप्त नहीं हुई है। शायद हर पीढ़ी अपनी पिछली पीढ़ी की भूलों को थोड़ा थोड़ा सुधारने आती है।


संध्या गहराने लगी। आरती की घंटियाँ गूँज उठीं। दीप जल पर तैरने लगे। वृद्ध ने पोते का हाथ थामा और लौटने लगा। जाते जाते पोते ने पीछे मुड़कर पूछा, "दादाजी, क्या यह सीढ़ी आपको पहचानती होगी?"


वृद्ध हँसा और बोला, "अगर पत्थरों के भी दिल होते, तो यह मुझे मेरे नाम से बुलाती।"


वे दोनों चले गए, पर मैं देर तक उसी वाक्य में भीगी रही। काश, वह जान पाता कि मैंने उसके बचपन से लेकर इस संध्या तक का हर कदम अपने भीतर सँभाल रखा है।


रात उतर आई। घाट शांत हो गया। गंगा अब भी बह रही थी। कानपुर अब भी साँस ले रहा था। मैंने शहर की ओर देखा और मन ही मन कहा 


"मैंने मिलों की सीटी सुनी है, कारखानों का मौन भी। मैंने आस्था की उजली लौ देखी है और लापरवाही की कालिमा भी। मैंने लोगों को गंगा से जीवन माँगते देखा है और उसी जीवन को बचाने का संकल्प लेते भी देखा है।"


मुझे अब विश्वास है कि शहर केवल इमारतों से नहीं, अपनी स्मृतियों और संस्कारों से जीवित रहते हैं। जब तक कोई बच्चा पहली बार गंगा को छूने आएगा, कोई वृद्ध अपने अतीत की तलाश में लौटेगा, और कोई हाथ इस नदी को स्वच्छ रखने के लिए आगे बढ़ेगा, तब तक कानपुर केवल नक्शे पर बना एक शहर नहीं रहेगा वह एक जीवित स्मृति बना रहेगा।

मैं आज भी यहीं हूँ।

मैं सरसैया घाट की सातवीं सीढ़ी हूँ।

मैं बोलती नहीं, केवल देखती हूँ। और जब तक मेरे ऊपर से होकर कोई मनुष्य गंगा तक उतरता रहेगा, मैं समय की इस अनकही कहानी की मौन साक्षी बनी रहूँगी।




लेखक के बारे में:

शिवम अंतापुरिया

कानपुर के किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले शिवम "अंतापुरिया" का साहित्यिक झुकाव इंटरमीडिएट के दौरान हुआ। वे राहों हवाओं में मन, ख्वाबों में तुम, पत्थरों के दर्द और Was Close To Love पुस्तकों के लेखक व कई कृतियों के संपादक हैं। उनकी रचनाएँ "बज़्म ए हिन्द," "समस्याओं ने घेरा," और "साहित्य नामा" सहित 30 से अधिक साझा संग्रहों में प्रकाशित हैं। वर्तमान में उनके उपन्यास अरण्यव्रती, तलाक या जिंदा लाश, और आठ बजे  प्रकाशनाधीन हैं। उन्हें प्रतिष्ठित साहित्य अटल सम्मान, स्टोरी मिरर के अवार्ड्स सहित ऑस्ट्रेलिया, मॉरीशस, कतर और कनाडा से अंतर्राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। 


Comments


bottom of page