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घंटाघर की ज़ुबानी, ल़ुधियाना की कहानी

Oct 6
6 min read

Third Position, Hindi, Nāgrika Youth Writing Contest 2026

By Jaiveer Singh

City: Ludhiana, Punjab


सन् 1906 से लुधियाना के ठीक बीच खड़ा घंटाघर इस शहर की रूह और इतिहास का खामोश गवाह है। लाल ईंटों से बनी यह दस मंज़िला इमारत कभी पूरे शहर को समय बताती थी। इसने 1947 के विभाजन का दर्दनाक घाव झेला और फिर खाली हाथ आए लोगों व प्रवासी मज़दूरों की मेहनत से इसे 'भारत का मैनचेस्टर' बनते देखा। यहाँ कारखानों के शोर और मशीनी तेल की गंध के बीच समाज सेवा और करुणा की असली आत्मा बसती है। आज आधुनिक विकास, कंक्रीट के विशाल पुलों और भागती गाड़ियों के बीच भी लुधियाना की असली रूह इसी घंटाघर के चौक की धूल में रची-बसी है।


Image: Author
Image: Author

मैं लुधियाना का घंटाघर हूँ। लाल ईंट और यू-पियर शैली से बनी दस मंज़िला एक पुरानी इमारत। लोग मुझे प्यार से 'घंटाघर' ही कहते हैं। मैं इस शहर के ठीक बीच-बीच खड़ा हूँ। मेरा निर्माण 1862 में शुरू हुआ था। पूरे चवालीस साल बाद, 1906 में मैं बनकर तैयार हुआ। मुझे बनाने वालों ने मेरा नाम महारानी विक्टोरिया के नाम पर रखा था। बाद में, समय बदला और मुझे 'भगवान महावीर जैन घंटाघर' का नया नाम मिला। लेकिन नामों से क्या होता है? मैं तो बस एक खामोश गवाह हूँ। मैंने इस शहर की रूह को बनते, धड़कते और धीरे से संवरते देखा है।


समय का भी क्या अजीब खेल है! जब लोगों के पास अपनी घड़ियाँ नहीं थीं, तब पूरा शहर समय जानने के लिए मेरी तरफ़ देखता था। मेरी भारी घंटी की आवाज़ मीलों दूर तक जाती थी। उस समय मेरे अंदर की मशीन को हर दिन हाथों से चाबी दी जाती थी। आज हर इंसान की जेब में और कलाई पर अपना समय है। अब मेरी तरह ही समय देखने के लिए सिर उठाकर नहीं देखता। मैं बस एक खूबसूरत निशानी बनकर रह गया हूँ। समय मापने की मशीनें बदल गई हैं, लेकिन समय का असली मतलब नहीं बदला। आज हम तेज़ तकनीक से जुड़े हैं, फिर भी हमारे पास एक-दूसरे के लिए वक़्त नहीं है। असली समय वह नहीं जब घड़ी की सुइयाँ धड़कती हैं; असली समय वह है जब हम अपने शहर और अपने आप को महसूस करने में डूब जाते हैं।


मुझे इस शहर का बहुत पुराना इतिहास याद है। यह शहर 1480 में लोदी वंश के समय बसा था। तब यह एक छोटा सा गाँव हुआ करता था, जिसका नाम 'मीर होता' था। सदियों तक यह शहर मुगलों, डचियों और ब्रिटिशों के अधीन रहा। मैंने इस ज़मीन को हर दौर में बदलते हुए देखा है। मुझे उन्नीसवीं सदी का सादा लुधियाना भी याद है। तब मेरे सामने का चौड़ा बाज़ार सचमुच बहुत चौड़ा और खुला हुआ करता था। मेरे पास ही घास मंडी हुआ करती थी। उन दिनों घोड़े-गाड़ियाँ ही यातायात का मुख्य साधन थीं और हवा में ताज़ी कटी घास की एक अलग ही महक होती थी। उन दिनों सतलुज नदी भी मेरे काफ़ी करीब से बहा करती थी, जो अब यहाँ से मीलों दूर खिसक गई है। सब कुछ कितना शांत और धीमा था।


फिर आया 1947 का साल। वह मेरी याद का सबसे गहरा और दर्दनाक घाव है। मेरे पास ही रेलवे स्टेशन है। मैंने उस साल उन रेलगाड़ियों की भारी चीखें सुनी हैं। मैंने अपने एक तरफ़ 1882 में बने फ़ील्ड गंज गेट को देखा, जहाँ से कई पुराने परिवार अपने पुश्तैनी संदूक बाँधकर हमेशा के लिए चले गए। दूसरी तरफ़ चौड़ा बाज़ार की पुरानी हवेलियों में सन्नाटा छा गया और घरों के बाहर लगे पुराने नेमप्लेट धुँधले पड़ गए। जब कोई शहर बँटता है, तो सिर्फ़ ज़मीन नहीं बँटती, उसका दिल भी बँट जाता है।


लेकिन मैंने इंसानी हौसले का सबसे बड़ा चमत्कार भी देखा है। बँटवारे के बाद पश्चिमी पंजाब से कई शरणार्थी यहाँ आए। उनके हाथ खाली थे, लेकिन आँखों में एक नई आग थी। उन्होंने मेरे ही साये में, इन तंग गलियों में हाथ से चलने वाली बुनाई की छोटी-छोटी मशीनें लगाईं। दरअसल, 1830 के दशक में कश्मीर से आए कारीगरों ने यहाँ ऊनी कपड़ों की बुनाई शुरू की थी; उन खाली हाथ आए लोगों ने उस पुराने हुनर को नई ज़िंदगी दी। धीरे-धीरे वो छोटी मशीनें बड़े कारखानों में बदल गईं। लोगों ने अपनी पुश्तैनी मेहनत से साइकल और मशीनों के पुर्जे बनाने शुरू किए। घास की महक की जगह अब मशीन के तेल, कचरे और ऊन की गंध ने ले ली। मेरे देखते ही देखते, मेरा यह छोटा सा शहर 'भारत का मैनचेस्टर' बन गया।


जैसे-जैसे कारखाने बढ़े, शहर का रंग-रूप फिर से बदलने लगा। मैंने देखा कि कैसे यहाँ की ठेठ पंजाबी बोली में हिंदी के शब्द प्यार से घुलने लगे। उत्तर प्रदेश, बिहार और ओडिशा से हज़ारों की संख्या में मज़दूर यहाँ आने लगे। आज जो भी चौथा इंसान मेरे नीचे से गुज़रता है, वह एक प्रवासी मज़दूर होता है। इन्हीं लोगों के पसीने और मेहनत ने इस शहर के साइकल और कपड़ा उद्योग को खड़ा किया है; ये मज़दूर इस शहर के नए और मज़बूत पहिये हैं। पसीने की कई भाषा या जाति नहीं होती। एक शहर बिल्कुल एक बुने हुए स्वेटर की तरह होता है; अलग-अलग राज्यों और धर्मों के धागे जब एक साथ जुड़ते हैं, तभी एक गर्म और मज़बूत समाज बनता है। जो इस ज़मीन पर पसीना बहाता है, यह शहर उसी का हो जाता है।


मैंने इस शहर में कई ज़मीन से जुड़े असली नायकों को देखा है। कोई भी शहर केवल अपनी बड़ी इमारतों या पैसों से महान नहीं बनता; वह महान बनता है अपने उन लोगों से, जो चुपचाप समाज के लिए अपना जीवन लगा देते हैं। जब कड़ाके की ठंड में शहर सिहर रहा होता है, तब मैं 'मनुखता दी सेवा' वाले गुरप्रीत सिंह मिंटू जैसे निस्वार्थ सेवक को देखता हूँ, जो समाज द्वारा ठुकराए गए बेसहारा लोगों को सड़कों से उठाकर नया जीवन देते हैं। कारखानों और मशीनों के इस लगातार शोर के बीच, ज्ञानी पिंदरपाल सिंह जी अपनी रूहानी और शांत वाणी से लोगों को आध्यात्मिक सुकून देते हैं।


जब सब कुछ बहुत तेज़ी से भाग रहा है, तब 'तुरन दा हुनर' वाले बापू बलकौर सिंह जैसे बुज़ुर्ग अपनी पारंपरिक कला और सब्र से आज की भागती हुई पीढ़ी को जड़ों से जुड़े रहने की सीख देते हैं। मैंने प्रिंसिपल आर. एस. पटियाल जैसे समर्पित शिक्षाविदों को देखा है, जिन्होंने हज़ारों बच्चों के ज़ेहन को तराशने में अपनी पूरी ज़िंदगी लगा दी। इसी मिट्टी ने भाविश अग्रवाल जैसे आधुनिक दौर के तकनीकी दिमाग को भी जन्म दिया, जिन्होंने इस शहर की रगों में दौड़ने वाले पहिये के जुनून को डिजिटल युग की नई भाषा दे दी। ये सभी लोग इस शहर की असली आत्मा हैं। शहर केवल चौड़ी सड़कों से बड़े नहीं होते; शहर बड़े होते हैं अपने लोगों की कभी न हार मानने वाली हिम्मत और एक-दूसरे के प्रति करुणा से।


आज का लुधियाना बहुत तेज़ है। चौड़ा बाज़ार अब इंसानों के समुद्र से भरा रहता है। खासकर रविवार के दिन यहाँ पैर रखने की भी जगह नहीं होती। अमृतसर के कुलचे और कचौड़ी की महक हवा में तैरती है। मेरे ठीक नीचे रेहड़ी वाले रोज़ "फटे-पुराने नोट बदलवा लो" की आवाज़ें लगाते हैं। आजकल मुझे शहर योजना के तहत अलग-अलग रंगों वाली शानदार चमकदार बत्तियों से सजा दिया गया है। रात में मैं बहुत रंग-बिरंगा और खूबसूरत लगता हूँ। प्रशासन मेरी देखभाल कर रहा है।


मेरे ठीक सामने कंक्रीट का एक विशाल पुल बन गया है। पहले मैं पूरे शहर की मीनार दूर से दिखाई देता था; अब इस पुल ने मुझे बीच से जैसे आड़ा कर दिया है। तेज़ रफ़्तार गाड़ियाँ मेरे बगल से गुज़र जाती हैं। जब कोई शहर भविष्य की तरफ़ बहुत तेजी से भागता है, तो कभी-कभी वह अपने ही अतीत से समय थामना भूल जाता है। विकास बहुत ज़रूरी है, लेकिन विकास ऐसा होना चाहिए जो पैदल चलने वाले आम इंसान को भी जगह दे। चौड़ी सड़कें तब तक अच्छी नहीं हैं, जब तक उनके नीचे चलने वाले मज़दूर और आम लोग सुरक्षित महसूस न करें।


लेकिन मुझे एक भी शिकायत नहीं है। यह शहर कभी भी एक शांत जगह नहीं रहा। यह एक ज़िंदा, धड़कता हुआ और मेहनत करने वाला शहर है। आज भले ही शहर की ज़्यादातर दौलत बड़े बाज़ारों में चली गई हो, लेकिन लुधियाना की असली रूह आज भी मेरे ही चौक की धूल में रची-बसी है। जब तक लुधियाना की इन गलियों में इंसानियत बचेगी, जब तक यहाँ मज़दूर का पसीना बहेगा, तब तक मेरी लाल ईंटों की धड़कन भी ऐसे ही चलती रहेगी। मेरी घड़ियाँ भले ही पुरानी हो जाएँ, लेकिन मेरी आत्मा हमेशा इस शहर से जुड़ी रहेगी। मैं यहाँ खड़ा था, आज भी खड़ा हूँ, और कल भी खड़ा रहूँगा… बस चुपचाप सब कुछ देखते हुए और आपका समय बताते हुए।


लेखक के बारे में:

जयवीर सिंह


जयवीर सिंह समकालीन विषयों के संवेदनशील विश्लेषक और स्तंभकार हैं।


राजीव गांधी नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ लॉ, पटियाला में कानून के छात्र जयवीर की लेखन-यात्रा स्कूल की पत्रिका 'अविरल' से शुरू होकर विश्वविद्यालय की पत्रिका 'कॉस्मॉस' के संपादन तक विस्तृत रही है। वे विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में भी नियमित रूप से लिखते रहते हैं।


नागरिक जीवन के विविध पहलुओं और सूक्ष्म बारीकियों पर उनकी गहरी पैठ है। वे समाज और कानून से जुड़ी बातों को बेहद सहज और जनसाधारण की भाषा में कहने का प्रयास करते हैं, जिससे पाठक उनके विचारों से सीधा जुड़ाव महसूस कर सके।


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